प्रापितेन चटुकाकुविडम्बं
लम्भितेन बहुयाचनलज्जाम् ।
अर्थिना यदघमर्जति दाता
तन्न लुम्पति विलम्ब्य ददानः ॥
प्रापितेन चटुकाकुविडम्बं
लम्भितेन बहुयाचनलज्जाम् ।
अर्थिना यदघमर्जति दाता
तन्न लुम्पति विलम्ब्य ददानः ॥
लम्भितेन बहुयाचनलज्जाम् ।
अर्थिना यदघमर्जति दाता
तन्न लुम्पति विलम्ब्य ददानः ॥
अन्वयः
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अर्थिना चटु-काकु-विडम्बम् प्रापितेन, बहु-याचन-लज्जाम् लम्भितेन (च सता) दाता यत् अघम् अर्जति, विलम्ब्य ददानः तत् न लुम्पति ।
Summary
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The sin that a giver earns by making a supplicant undergo the mockery of flattering and plaintive tones and the shame of much begging, he does not erase by giving after a delay.
पदच्छेदः
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| प्रापितेन | प्रापित (प्र√आप्+णिच्+क्त, ३.१) | by one who is made to attain |
| चटुकाकुविडम्बं | चटु–काकु–विडम्ब (२.१) | the mockery of flattering and plaintive tones |
| लम्भितेन | लम्भित (√लभ्+णिच्+क्त, ३.१) | by one who is made to get |
| बहुयाचनलज्जाम् | बहु–याचन–लज्जा (२.१) | the shame of much begging |
| अर्थिना | अर्थिन् (३.१) | by the supplicant |
| यदघमर्जति | यद् (२.१)–अघ (२.१)–अर्जति (√अर्ज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | what sin earns |
| दाता | दातृ (१.१) | the giver |
| तन्न | तद् (२.१)–न | that not |
| लुम्पति | लुम्पति (√लुप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | erases |
| विलम्ब्य | विलम्ब्य (वि√लम्ब्+ल्यप्) | having delayed |
| ददानः | ददान (√दा+शानच्, १.१) | giving |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रा | पि | ते | न | च | टु | का | कु | वि | ड | म्बं |
| ल | म्भि | ते | न | ब | हु | या | च | न | ल | ज्जाम् |
| अ | र्थि | ना | य | द | घ | म | र्ज | ति | दा | ता |
| त | न्न | लु | म्प | ति | वि | ल | म्ब्य | द | दा | नः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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