अन्वयः
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एषाम् अभीप्सितम् कथम् मीयताम्? अयाचितम् एव कथम् दीयताम्? यः वाञ्छाम् कलयन् अपि अर्थि-वाक्-अवसरम् सहते, तम् धिक् अस्तु ।
Summary
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(Nala thinks) "How can their desire be measured? How can it be given even unasked? Fie upon him who, even knowing the wish, tolerates the occasion for the supplicant to speak."
पदच्छेदः
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| मीयतां | मीयताम् (√मा भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | let it be measured |
| कथम् | कथम् | how |
| अभीप्सितम् | अभीप्सित (अभि√आप्+सन्+क्त, १.१) | the desired object |
| एषां | इदम् (६.३) | of these |
| दीयतां | दीयताम् (√दा भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | let it be given |
| कथम् | कथम् | how |
| अयाचितमेव | अ–याचित (√याच्+क्त, १.१)–एव | unasked indeed |
| तं | तद् (२.१) | to him |
| धिगस्तु | धिक्–अस्तु (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | fie be |
| कलयन्नपि | कलयत् (√कَل+शतृ, १.१)–अपि | knowing even |
| वाञ्छाम् | वाञ्छा (२.१) | the wish |
| अर्थिवागवसरं | अर्थिन्–वाच्–अवसर (२.१) | the occasion for the supplicant's speech |
| सहते | सहते (√सह् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | tolerates |
| यः | यद् (१.१) | who |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मी | य | तां | क | थ | म | भी | प्सि | त | मे | षां |
| दी | य | तां | क | थ | म | या | चि | त | मे | व |
| तं | धि | ग | स्तु | क | ल | य | न्न | पि | वा | ञ्छा |
| म | र्थि | वा | ग | व | स | रं | स | ह | ते | यः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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