आलिमात्मसुभगत्वसगर्वा
कापि शृण्वति मघोनि बभाषे ।
वीक्षणेऽपि सघृणासि नृणां किं
यासि न त्वमपि सार्थगुणेन ॥
आलिमात्मसुभगत्वसगर्वा
कापि शृण्वति मघोनि बभाषे ।
वीक्षणेऽपि सघृणासि नृणां किं
यासि न त्वमपि सार्थगुणेन ॥
कापि शृण्वति मघोनि बभाषे ।
वीक्षणेऽपि सघृणासि नृणां किं
यासि न त्वमपि सार्थगुणेन ॥
अन्वयः
AI
मघोनि शृण्वति (सति) आत्मसुभगत्वसगर्वा का अपि आलिम् बभाषे। (त्वम्) नृणाम् वीक्षणे अपि सघृणा असि। त्वम् अपि सार्थगुणेन किम् न यासि?
Summary
AI
While Indra was listening, a certain Apsara, proud of her own good fortune, spoke to her friend: "You are compassionate even in looking at men. Why don't you also go with the one who possesses meaningful qualities (Nala)?"
पदच्छेदः
AI
| आलिम् | आलि (२.१) | to a friend |
| आत्मसुभगत्वसगर्वा | आत्म–सुभगत्व–सगर्वा (१.१) | proud of her own good fortune |
| कापि | का अपि (१.१) | some Apsara |
| शृण्वति | शृण्वत् (√श्रु+शतृ, ७.१) | while listening |
| मघोनि | मघवन् (७.१) | Indra |
| बभाषे | बभाषे (√भाष् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | spoke |
| वीक्षणे | वीक्षण (७.१) | in the matter of seeing |
| अपि | अपि | even |
| सघृणा | सघृण (१.१) | compassionate |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are |
| नृणाम् | नृ (६.३) | of men |
| किम् | किम् | why |
| यासि | यासि (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you go |
| न | न | not |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| अपि | अपि | also |
| सार्थगुणेन | सार्थ–गुण (३.१) | with the one possessing meaningful qualities |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | लि | मा | त्म | सु | भ | ग | त्व | स | ग | र्वा |
| का | पि | शृ | ण्व | ति | म | घो | नि | ब | भा | षे |
| वी | क्ष | णे | ऽपि | स | घृ | णा | सि | नृ | णां | किं |
| या | सि | न | त्व | म | पि | सा | र्थ | गु | णे | न |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.