वेद यद्यपि न कोऽपि भवन्तं
हन्त हन्त्रकरुणं विरुणद्धि ।
पृच्छ्यसे तदपि येन विवेक-
प्रोञ्छनाय विषये रससेकः ॥
वेद यद्यपि न कोऽपि भवन्तं
हन्त हन्त्रकरुणं विरुणद्धि ।
पृच्छ्यसे तदपि येन विवेक-
प्रोञ्छनाय विषये रससेकः ॥
हन्त हन्त्रकरुणं विरुणद्धि ।
पृच्छ्यसे तदपि येन विवेक-
प्रोञ्छनाय विषये रससेकः ॥
अन्वयः
AI
यद्यपि कः अपि भवन्तम् न वेद, हन्त, (सः) हन्तृ-अकरुणम् विरुणद्धि । तत् अपि पृच्छ्यसे, येन विषये रस-सेकः विवेक-प्रोञ्छनाय (भवति) ।
Summary
AI
"Although no one knows you, alas, this situation obstructs even one who is merciless towards his enemies. Nevertheless, you are being asked because, in worldly matters, an infusion of sentiment serves to wipe away discernment."
पदच्छेदः
AI
| वेद | वेद (√विद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | knows |
| यद्यपि | यद्यपि | although |
| न | न | not |
| कः | किम् (१.१) | anyone |
| अपि | अपि | even |
| भवन्तम् | भवत् (२.१) | you |
| हन्त | हन्त | alas |
| हन्तृ | हन्तृ | towards the slayer (of enemies) |
| अकरुणम् | अकरुण (२.१) | mercilessness |
| विरुणद्धि | विरुणद्धि (वि√रुध् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | obstructs |
| पृच्छ्यसे | पृच्छ्यसे (√प्रच्छ् +यक् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you are being asked |
| तत् | तत् | nevertheless |
| अपि | अपि | also |
| येन | यद् (३.१) | by which |
| विवेक | विवेक | discernment |
| प्रोञ्छनाय | प्रोञ्छन (४.१) | for wiping away |
| विषये | विषय (७.१) | in worldly matters |
| रस | रस | of sentiment |
| सेकः | सेक (१.१) | infusion |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वे | द | य | द्य | पि | न | को | ऽपि | भ | व | न्तं |
| ह | न्त | ह | न्त्र | क | रु | णं | वि | रु | ण | द्धि |
| पृ | च्छ्य | से | त | द | पि | ये | न | वि | वे | क |
| प्रो | ञ्छ | ना | य | वि | ष | ये | र | स | से | कः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.