तेन जाग्रदधृतिर्दिवमागां
संख्यसौख्यमनुसर्तुमनु त्वाम् ।
यन्मृधं क्षितिभृतां न विलोके
तन्निमग्नमनसां भुवि लोके ॥
तेन जाग्रदधृतिर्दिवमागां
संख्यसौख्यमनुसर्तुमनु त्वाम् ।
यन्मृधं क्षितिभृतां न विलोके
तन्निमग्नमनसां भुवि लोके ॥
संख्यसौख्यमनुसर्तुमनु त्वाम् ।
यन्मृधं क्षितिभृतां न विलोके
तन्निमग्नमनसां भुवि लोके ॥
अन्वयः
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तेन जाग्रत्-अधृतिः (अहम्) त्वाम् अनु संख्य-सौख्यम् अनुसर्तुम् दिवम् आगाम् । यत् भुवि लोके तत्-निमग्न-मनसाम् क्षितिभृताम् मृधम् न विलोके ।
Summary
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For that reason, with growing impatience, I came to heaven following you to pursue the joy of battle. Because, in the world on earth, I do not see any conflict among the kings, whose minds are completely absorbed in her (Damayanti).
पदच्छेदः
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| तेन | तद् (३.१) | for that reason |
| जाग्रत् | जाग्रत् (√जागृ+शतृ) | growing |
| अधृतिः | अधृति (१.१) | impatience |
| दिवम् | दिव् (२.१) | to heaven |
| आगाम् | आगाम् (आ√गा कर्तरि लुङ् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I came |
| संख्य | संख्य | of battle |
| सौख्यम् | सौख्य (२.१) | the pleasure |
| अनुसर्तुम् | अनुसर्तुम् (अनु√सृ+तुमुन्) | to pursue |
| अनु | अनु | after |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| यत् | यत् | because |
| मृधम् | मृध् (२.१) | conflict |
| क्षितिभृताम् | क्षितिभृत् (६.३) | of the kings |
| न | न | not |
| विलोके | विलोके (वि√लोक् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I see |
| तत् | तद् | in that (her) |
| निमग्न | निमग्न (नि√मस्ज्+क्त) | immersed |
| मनसाम् | मनस् (६.३) | whose minds |
| भुवि | भू (७.१) | on earth |
| लोके | लोक (७.१) | in the world |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ते | न | जा | ग्र | द | धृ | ति | र्दि | व | मा | गां |
| सं | ख्य | सौ | ख्य | म | नु | स | र्तु | म | नु | त्वाम् |
| य | न्मृ | धं | क्षि | ति | भृ | तां | न | वि | लो | के |
| त | न्नि | म | ग्न | म | न | सां | भु | वि | लो | के |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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