येषु येषु सरसा दमयन्ती
भूषणेषु यदि वापि गुणेषु ।
तत्र तत्र कलयापि विशेषो
यः स हि क्षितिभृतां पुरुषार्थः ॥
येषु येषु सरसा दमयन्ती
भूषणेषु यदि वापि गुणेषु ।
तत्र तत्र कलयापि विशेषो
यः स हि क्षितिभृतां पुरुषार्थः ॥
भूषणेषु यदि वापि गुणेषु ।
तत्र तत्र कलयापि विशेषो
यः स हि क्षितिभृतां पुरुषार्थः ॥
अन्वयः
AI
सरसा दमयन्ती येषु येषु भूषणेषु यदि वा अपि गुणेषु (आसक्ता अस्ति), तत्र तत्र यः कलया अपि विशेषः (अस्ति), सः हि क्षितिभृताम् पुरुषार्थः (अस्ति) ।
Summary
AI
Whatever slight distinction exists in any of the ornaments or qualities in which the passionate Damayanti takes interest, that very distinction has become the ultimate goal for the kings.
पदच्छेदः
AI
| येषु | यद् (७.३) | in whichever |
| येषु | यद् (७.३) | in whichever |
| सरसा | सरस (१.१) | passionate |
| दमयन्ती | दमयन्ती (१.१) | Damayanti |
| भूषणेषु | भूषण (७.३) | ornaments |
| यदि | यदि | or |
| वा | वा | or |
| अपि | अपि | also |
| गुणेषु | गुण (७.३) | in qualities |
| तत्र | तत्र | there |
| तत्र | तत्र | there |
| कलया | कला (३.१) | by a small part |
| अपि | अपि | even |
| विशेषः | विशेष (१.१) | distinction |
| यः | यद् (१.१) | which |
| सः | तद् (१.१) | that |
| हि | हि | indeed |
| क्षितिभृताम् | क्षितिभृत् (६.३) | of the kings |
| पुरुषार्थः | पुरुषार्थ (१.१) | the ultimate goal |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ये | षु | ये | षु | स | र | सा | द | म | य | न्ती |
| भू | ष | णे | षु | य | दि | वा | पि | गु | णे | षु |
| त | त्र | त | त्र | क | ल | या | पि | वि | शे | षो |
| यः | स | हि | क्षि | ति | भृ | तां | पु | रु | षा | र्थः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.