वीक्ष्य तस्य विनये परिपाकं
पाकशासनपदं स्पृशतोऽपि ।
नारदः प्रमदगद्गदयोक्त्या
विस्मितः स्मितपुरः सरमूचे ॥
वीक्ष्य तस्य विनये परिपाकं
पाकशासनपदं स्पृशतोऽपि ।
नारदः प्रमदगद्गदयोक्त्या
विस्मितः स्मितपुरः सरमूचे ॥
पाकशासनपदं स्पृशतोऽपि ।
नारदः प्रमदगद्गदयोक्त्या
विस्मितः स्मितपुरः सरमूचे ॥
अन्वयः
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पाक-शासन-पदं स्पृशतः अपि तस्य विनये परिपाकं वीक्ष्य विस्मितः नारदः प्रमद-गद्गदया उक्त्या स्मित-पुरःसरम् ऊचे।
Summary
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Seeing the perfection of humility in him, even though he held the high position of Indra, the astonished Narada, with his speech choked with joy, spoke, preceded by a smile.
पदच्छेदः
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| वीक्ष्य | वीक्ष्य (वि√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| विनये | विनय (७.१) | in humility |
| परिपाकम् | परिपाक (२.१) | maturity |
| पाकशासनपदम् | पाक–शासन–पद (२.१) | the position of Indra |
| स्पृशतः | स्पृशत् (√स्पृश्+शतृ, ६.१) | of him who holds |
| अपि | अपि | even |
| नारदः | नारद (१.१) | Narada |
| प्रमदगद्गदया | प्रमद–गद्गद (३.१) | choked with joy |
| उक्त्या | उक्ति (३.१) | with speech |
| विस्मितः | विस्मित (वि√स्मि+क्त, १.१) | astonished |
| स्मितपुरःसरम् | स्मित–पुरःसरम् | preceded by a smile |
| ऊचे | ऊचे (√वच् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | said |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वी | क्ष्य | त | स्य | वि | न | ये | प | रि | पा | कं |
| पा | क | शा | स | न | प | दं | स्पृ | श | तो | ऽपि |
| ना | र | दः | प्र | म | द | ग | द्ग | द | यो | क्त्या |
| वि | स्मि | तः | स्मि | त | पु | रः | स | र | मू | चे |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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