श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
तस्य श्रीविजयप्रशस्तिरचनातातस्य नव्ये महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गोऽगमत्पञ्चमः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
तस्य श्रीविजयप्रशस्तिरचनातातस्य नव्ये महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गोऽगमत्पञ्चमः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
तस्य श्रीविजयप्रशस्तिरचनातातस्य नव्ये महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गोऽगमत्पञ्चमः ॥
अन्वयः
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कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः श्रीहीरः च मामल्लदेवी च जितेन्द्रियचयम् यम् श्रीहर्षम् सुतम् सुषुवे, तस्य श्रीविजयप्रशस्तिरचनातातस्य (श्रीहर्षस्य) नव्ये चारुणि नैषधीयचरिते महाकाव्ये पञ्चमः सर्गः अगमत् ।
Summary
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Here ends the fifth canto of the new and beautiful epic poem, the Naishadhiyacharita, composed by Shriharsha, the son of Shrihira—who was the crest-jewel on the crowns of the assembly of great poets—and Mamalladevi, who had conquered his senses, and whose father composed the Vijayaprashasti.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Shriharsha |
| कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः | कविराज–राजि–मुकुट–अलंकार–हीर (१.१) | the diamond ornament on the crowns of the assembly of great poets |
| सुतम् | सुत (२.१) | as a son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Shrihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√सू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | begot |
| जितेन्द्रियचयम् | जित–इन्द्रिय–चय (२.१) | who had conquered his senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| श्रीविजयप्रशस्तिरचनातातस्य | श्री–विजयप्रशस्ति–रचना–तात (६.१) | of him whose father composed the Vijayaprashasti |
| नव्ये | नव्य (७.१) | in the new |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | in the epic poem |
| चारुणि | चारु (७.१) | in the beautiful |
| नैषधीयचरिते | नैषधीयचरित (७.१) | in the Naishadhiyacharita |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | the canto |
| अगमत् | अगमत् (√गम् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | has gone (ended) |
| पञ्चमः | पञ्चम (१.१) | the fifth |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| त | स्य | श्री | वि | ज | य | प्र | श | स्ति | र | च | ना | ता | त | स्य | न | व्ये | म | हा |
| का | व्ये | चा | रु | णि | नै | ष | धी | य | च | रि | ते | स | र्गो | ऽग | म | त्प | ञ्च | मः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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