इत्याकर्ण्य क्षितीशस्त्रिदशपरिषदस्ता गिरश्चाटुगर्भा
वैदर्भीकामुकोऽपि प्रसभविनिहितं दूत्यभारं बभार ।
अङ्गीकारं गतेऽस्मिन्नमरपरिवृढः संभृतानन्दमूचे
भूयादन्तर्धिसिद्धेरनुविहितभवच्चित्तता यत्र तत्र ॥
इत्याकर्ण्य क्षितीशस्त्रिदशपरिषदस्ता गिरश्चाटुगर्भा
वैदर्भीकामुकोऽपि प्रसभविनिहितं दूत्यभारं बभार ।
अङ्गीकारं गतेऽस्मिन्नमरपरिवृढः संभृतानन्दमूचे
भूयादन्तर्धिसिद्धेरनुविहितभवच्चित्तता यत्र तत्र ॥
वैदर्भीकामुकोऽपि प्रसभविनिहितं दूत्यभारं बभार ।
अङ्गीकारं गतेऽस्मिन्नमरपरिवृढः संभृतानन्दमूचे
भूयादन्तर्धिसिद्धेरनुविहितभवच्चित्तता यत्र तत्र ॥
अन्वयः
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क्षितीशः इति त्रिदशपरिषदः ताः चाटुगर्भाः गिरः आकर्ण्य, वैदर्भीकामुकः अपि प्रसभविनिहितम् दूत्यभारम् बभार । अस्मिन् अङ्गीकारम् गते (सति), अमरपरिवृढः संभृतानन्दम् ऊचे - यत्र तत्र अन्तर्धिसिद्धिः भवच्चित्तताम् अनुविहिता भूयात् ।
Summary
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Having heard these flattering words from the assembly of gods, King Nala, though a lover of Damayanti, forcibly accepted the burden of the embassy. When he agreed, Indra, filled with joy, said, 'May the power of invisibility follow your will wherever you go.'
पदच्छेदः
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| इति | इति | thus |
| आकर्ण्य | आकर्ण्य (आ√कर्ण्+ल्यप्) | having heard |
| क्षितीशः | क्षिति–ईश (१.१) | the king (Nala) |
| त्रिदशपरिषदः | त्रिदश–परिषद् (६.१) | of the assembly of gods |
| ताः | तद् (२.३) | those |
| गिरः | गिर् (२.३) | words |
| चाटुगर्भाः | चाटु–गर्भाः (२.३) | filled with flattery |
| वैदर्भीकामुकः | वैदर्भी–कामुक (१.१) | a lover of the princess of Vidarbha |
| अपि | अपि | even though |
| प्रसभविनिहितम् | प्रसभ–विनिहित (वि√निहि+क्त, २.१) | forcibly placed |
| दूत्यभारम् | दूत्य–भार (२.१) | the burden of the embassy |
| बभार | बभार (√भृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | bore |
| अङ्गीकारम् | अङ्गीकार (२.१) | acceptance |
| गते | गत (√गम्+क्त, ७.१) | having gone to |
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | he |
| अमरपरिवृढः | अमर–परिवृढ (१.१) | the chief of the gods (Indra) |
| संभृतानन्दम् | संभृत–आनन्दम् (२.१) | with collected joy |
| ऊचे | ऊचे (√वच् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | said |
| भूयात् | भूयात् (√भू कर्तरि आशीर्लिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may it be |
| अन्तर्धिसिद्धेः | अन्तर्धि–सिद्धि (१.१) | the accomplishment of invisibility |
| अनुविहितभवच्चित्तता | अनुविहित–भवत्–चित्तता (१.१) | the state of following your will |
| यत्र | यत्र | wherever |
| तत्र | तत्र | there |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्या | क | र्ण्य | क्षि | ती | श | स्त्रि | द | श | प | रि | ष | द | स्ता | गि | र | श्चा | टु | ग | र्भा |
| वै | द | र्भी | का | मु | को | ऽपि | प्र | स | भ | वि | नि | हि | तं | दू | त्य | भा | रं | ब | भा | र |
| अ | ङ्गी | का | रं | ग | ते | ऽस्मि | न्न | म | र | प | रि | वृ | ढः | सं | भृ | ता | न | न्द | मू | चे |
| भू | या | द | न्त | र्धि | सि | द्धे | र | नु | वि | हि | त | भ | व | च्चि | त्त | ता | य | त्र | त | त्र |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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