अर्थिता त्वयि गतेषु सुरेषु
म्लानदानजनिजोरुयशः श्रीः ।
अद्य पाण्डु गगनं सुरशाखी
केवलेन कुसुमेन विधत्तम् ॥
अर्थिता त्वयि गतेषु सुरेषु
म्लानदानजनिजोरुयशः श्रीः ।
अद्य पाण्डु गगनं सुरशाखी
केवलेन कुसुमेन विधत्तम् ॥
म्लानदानजनिजोरुयशः श्रीः ।
अद्य पाण्डु गगनं सुरशाखी
केवलेन कुसुमेन विधत्तम् ॥
अन्वयः
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त्वयि अर्थिता (कृता सति) सुरेषु गतेषु, म्लानदानजनिज-उरुयशःश्रीः (सन्) सुरशाखी अद्य केवलेन कुसुमेन गगनम् पाण्डु विधत्तम् ।
Summary
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'Now that the gods have departed after making their request to you, the celestial tree (Parijata), its great fame and beauty born from its generous gifts now faded, makes the sky pale with its lone flower (the moon). '
पदच्छेदः
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| अर्थिता | अर्थित (√अर्थ्+णिच्+क्त+टाप्, १.१) | the request having been made |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | to you |
| गतेषु | गत (√गम्+क्त, ७.३) | having gone |
| सुरेषु | सुर (७.३) | the gods |
| म्लानदानजनिजोरुयशःश्रीः | म्लान–दान–जनिज–उरु–यशस्–श्री (१.१) | whose great fame and beauty born from its generous gifts has faded |
| अद्य | अद्य | today |
| पाण्डु | पाण्डु (२.१) | pale |
| गगनम् | गगन (२.१) | the sky |
| सुरशाखी | सुरशाखिन् (१.१) | the celestial tree (Parijata) |
| केवलेन | केवल (३.१) | with the lone |
| कुसुमेन | कुसुम (३.१) | flower (the moon) |
| विधत्तम् | विधत्ते (वि√धा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | makes |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | र्थि | ता | त्व | यि | ग | ते | षु | सु | रे | षु |
| म्ला | न | दा | न | ज | नि | जो | रु | य | शः | श्रीः |
| अ | द्य | पा | ण्डु | ग | ग | नं | सु | र | शा | खी |
| के | व | ले | न | कु | सु | मे | न | वि | ध | त्तम् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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