प्रेयसी जितसुधांशुमुखश्रीः
या न मुञ्चति दिगन्तगतापि ।
भङ्गिसङ्गमकुरङ्गदृगर्थे
कः कदर्थयति तामपि कीर्तिम् ॥
प्रेयसी जितसुधांशुमुखश्रीः
या न मुञ्चति दिगन्तगतापि ।
भङ्गिसङ्गमकुरङ्गदृगर्थे
कः कदर्थयति तामपि कीर्तिम् ॥
या न मुञ्चति दिगन्तगतापि ।
भङ्गिसङ्गमकुरङ्गदृगर्थे
कः कदर्थयति तामपि कीर्तिम् ॥
अन्वयः
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जितसुधांशुमुखश्रीः या प्रेयसी दिगन्तगता अपि न मुञ्चति, ताम् अपि कीर्तिम् भङ्गिसङ्गमकुरङ्गदृक् अर्थे कः कदर्थयति?
Summary
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Who would tarnish that fame—which, like a beloved whose face surpasses the moon's beauty, does not forsake one even when they go to the ends of the earth—for the sake of a fickle, deer-eyed woman?
पदच्छेदः
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| प्रेयसी | प्रेयसी (१.१) | a beloved |
| जितसुधांशुमुखश्रीः | जित–सुधांशु–मुख–श्री (१.१) | whose beauty of face surpasses that of the moon |
| या | यद् (१.१) | who |
| न | न | not |
| मुञ्चति | मुञ्चति (√मुच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | leaves |
| दिगन्तगता | दिगन्त–गत (√गम्+क्त, १.१) | gone to the ends of the earth |
| अपि | अपि | even |
| भङ्गिसङ्गमकुरङ्गदृक् | भङ्गि–सङ्गम–कुरङ्ग–दृश् | a fickle, deer-eyed woman |
| अर्थे | अर्थ (७.१) | for the sake of |
| कः | किम् (१.१) | who |
| कदर्थयति | कदर्थयति (√कदर्थय कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | tarnishes/disregards |
| ताम् | तद् (२.१) | that |
| अपि | अपि | also |
| कीर्तिम् | कीर्ति (२.१) | fame |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रे | य | सी | जि | त | सु | धां | शु | मु | ख | श्रीः |
| या | न | मु | ञ्च | ति | दि | ग | न्त | ग | ता | पि |
| भ | ङ्गि | स | ङ्ग | म | कु | र | ङ्ग | दृ | ग | र्थे |
| कः | क | द | र्थ | य | ति | ता | म | पि | की | र्तिम् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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