यां मनोरथमयीं हृदि कृत्वा
यः श्वसिम्यथ कथं स तदग्रे ।
भावगुप्तिमवलम्बितुमीशे
दुर्जया हि विषया विदुषापि ॥
यां मनोरथमयीं हृदि कृत्वा
यः श्वसिम्यथ कथं स तदग्रे ।
भावगुप्तिमवलम्बितुमीशे
दुर्जया हि विषया विदुषापि ॥
यः श्वसिम्यथ कथं स तदग्रे ।
भावगुप्तिमवलम्बितुमीशे
दुर्जया हि विषया विदुषापि ॥
अन्वयः
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याम् मनोरथमयीम् हृदि कृत्वा यः (अहम्) श्वसिमि, अथ सः (अहम्) तत् अग्रे कथम् भावगुप्तिम् अवलम्बितुम् ईशे? हि विषयाः विदुषा अपि दुर्जयाः (भवन्ति) ।
Summary
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"I, who live and breathe only by holding her, who is the embodiment of my desires, in my heart—how then can I manage to conceal my feelings in her presence? For the objects of the senses are difficult to conquer, even for a wise person."
पदच्छेदः
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| याम् | यद् (२.१) | whom |
| मनोरथमयीम् | मनोरथ–मयी (२.१) | who is the embodiment of my desires |
| हृदि | हृद् (७.१) | in my heart |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ+क्त्वा) | having placed |
| यः | यद् (१.१) | I who |
| श्वसिमि | श्वसिमि (√श्वस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | live/breathe |
| अथ | अथ | then |
| कथम् | कथम् | how |
| सः | तद् (१.१) | that I |
| तत् | तद् (६.१) | her |
| अग्रे | अग्र (७.१) | in front of |
| भावगुप्तिम् | भाव–गुप्ति (२.१) | concealment of feelings |
| अवलम्बितुम् | अवलम्बितुम् (अव√लम्ब्+तुमुन्) | to maintain |
| ईशे | ईशे (√ईश् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | am I able |
| दुर्जयाः | दुर्जय (१.३) | difficult to conquer |
| हि | हि | for |
| विषयाः | विषय (१.३) | the objects of the senses |
| विदुषा | विद्वस् (३.१) | by a wise person |
| अपि | अपि | even |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यां | म | नो | र | थ | म | यीं | हृ | दि | कृ | त्वा |
| यः | श्व | सि | म्य | थ | क | थं | स | त | द | ग्रे |
| भा | व | गु | प्ति | म | व | ल | म्बि | तु | मी | शे |
| दु | र्ज | या | हि | वि | ष | या | वि | दु | षा | पि |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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