यन्मतौ विमलदर्पणिकायां
संमुखस्थमखिलं खलु तत्त्वम् ।
तेऽपि किं वितरथेदृशमाज्ञां
या न यस्य सदृशी वितरीतुम् ॥
यन्मतौ विमलदर्पणिकायां
संमुखस्थमखिलं खलु तत्त्वम् ।
तेऽपि किं वितरथेदृशमाज्ञां
या न यस्य सदृशी वितरीतुम् ॥
संमुखस्थमखिलं खलु तत्त्वम् ।
तेऽपि किं वितरथेदृशमाज्ञां
या न यस्य सदृशी वितरीतुम् ॥
अन्वयः
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यत् (युष्माकम्) विमलदर्पणिकायाम् मतौ अखिलम् तत्त्वम् खलु संमुखस्थम् (अस्ति) । ते (यूयम्) अपि ईदृशम् आज्ञाम् किम् वितरथ, या यस्य वितरीतुम् सदृशी न (अस्ति)?
Summary
AI
"In your minds, which are like flawless mirrors, all truth is indeed reflected. Why then do even you give such a command, which is not befitting for the one to whom it is given?"
पदच्छेदः
AI
| यत् | यद् (६.३) | whose |
| मतौ | मति (७.१) | in the mind |
| विमलदर्पणिकायाम् | विमल–दर्पणिका (७.१) | like a flawless mirror |
| संमुखस्थम् | संमुख–स्थ (१.१) | is reflected |
| अखिलम् | अखिल (१.१) | all |
| खलु | खलु | indeed |
| तत्त्वम् | तत्त्व (१.१) | truth |
| ते | तद् (१.३) | you |
| अपि | अपि | even |
| किम् | किम् | why |
| वितरथ | वितरथ (वि√तृ कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. बहु.) | do you give |
| ईदृशम् | ईदृश (२.१) | such |
| आज्ञाम् | आज्ञा (२.१) | a command |
| या | यद् (१.१) | which |
| न | न | not |
| यस्य | यद् (६.१) | for whom |
| सदृशी | सदृशी (१.१) | is befitting |
| वितरीतुम् | वितरीतुम् (वि√तृ+तुमुन्) | to be given |
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | न्म | तौ | वि | म | ल | द | र्प | णि | का | यां |
| सं | मु | ख | स्थ | म | खि | लं | ख | लु | त | त्त्वम् |
| ते | ऽपि | किं | वि | त | र | थे | दृ | श | मा | ज्ञां |
| या | न | य | स्य | स | दृ | शी | वि | त | री | तुम् |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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