स्मर स मद्दुरितैरफलीकृतो
भगवतोऽपि भवद्दहनश्रमः ।
सुरहिताय हुतात्मतनुः पुनः
ननु जनुर्दिवि तत्क्षणमापिथ ॥
स्मर स मद्दुरितैरफलीकृतो
भगवतोऽपि भवद्दहनश्रमः ।
सुरहिताय हुतात्मतनुः पुनः
ननु जनुर्दिवि तत्क्षणमापिथ ॥
भगवतोऽपि भवद्दहनश्रमः ।
सुरहिताय हुतात्मतनुः पुनः
ननु जनुर्दिवि तत्क्षणमापिथ ॥
अन्वयः
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स्मर ! मत् दुरितैः भगवतः अपि सः भवत् दहन श्रमः अफलीकृतः । ननु सुरहिताय हुत आत्मतनुः (त्वम्) पुनः तत्क्षणम् दिवि जनुः आपिथ ।
Summary
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O Smara! By my sins, even the effort of the Lord (Shiva) in burning you was rendered fruitless. Indeed, having sacrificed your own body for the good of the gods, you immediately obtained a new birth in heaven.
पदच्छेदः
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| स्मर | स्मर (८.१) | O Smara |
| सः | तद् (१.१) | that |
| मद्दुरितैः | अस्मद्–दुरित (३.३) | by my sins |
| अफलीकृतः | अफलीकृत (√कृ+च्वि+क्त, १.१) | was made fruitless |
| भगवतः | भगवत् (६.१) | of the Lord |
| अपि | अपि | even |
| भवद्दहनश्रमः | भवत्–दहन–श्रम (१.१) | the effort of burning you |
| सुरहिताय | सुर–हित (४.१) | for the good of the gods |
| हुतात्मतनुः | हुत (√हन्+क्त)–आत्मन्–तनु (१.१) | one who has sacrificed his own body |
| पुनः | पुनर् | again |
| ननु | ननु | indeed |
| जनुः | जनुस् (२.१) | birth |
| दिवि | दिव् (७.१) | in heaven |
| तत्क्षणम् | तत्क्षणम् | at that very moment |
| आपिथ | आपिथ (√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you obtained |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | र | स | म | द्दु | रि | तै | र | फ | ली | कृ | तो |
| भ | ग | व | तो | ऽपि | भ | व | द्द | ह | न | श्र | मः |
| सु | र | हि | ता | य | हु | ता | त्म | त | नुः | पु | नः |
| न | नु | ज | नु | र्दि | वि | त | त्क्ष | ण | मा | पि | थ |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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