अपि विधिः कुसुमानि तवाशुगा-
न्स्मर विधाय न निर्वृतिमाप्तवान् ।
अदित पञ्च हि ते स नियम्य तां-
स्तदपि तैर्बत जर्जरितं जगत् ॥
अपि विधिः कुसुमानि तवाशुगा-
न्स्मर विधाय न निर्वृतिमाप्तवान् ।
अदित पञ्च हि ते स नियम्य तां-
स्तदपि तैर्बत जर्जरितं जगत् ॥
न्स्मर विधाय न निर्वृतिमाप्तवान् ।
अदित पञ्च हि ते स नियम्य तां-
स्तदपि तैर्बत जर्जरितं जगत् ॥
अन्वयः
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स्मर ! विधिः तव कुसुमानि आशुगान् विधाय अपि निर्वृतिं न आप्तवान्। हि सः ते पञ्च (एव) अदित, तान् नियम्य (अदित)। तत् अपि बत तैः जगत् जर्जरितम्।
Summary
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"O Kama! Even after making flowers your arrows, Brahma was not at ease. He gave you only five, and that too with restrictions. And yet, alas, the world is shattered by them."
पदच्छेदः
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| अपि | अपि | Even |
| विधिः | विधि (१.१) | Brahma, |
| कुसुमानि | कुसुम (२.३) | flowers |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| आशुगान् | आशुग (२.३) | arrows |
| स्मर | स्मर (८.१) | O Kama, |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | after making, |
| न | न | not |
| निर्वृतिम् | निर्वृति (२.१) | peace |
| आप्तवान् | आप्तवत् (√आप्+क्तवतु, १.१) | attained. |
| अदित | अदित (√दा कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he gave |
| पञ्च | पञ्चन् (२.३) | five |
| हि | हि | For |
| ते | युष्मद् (४.१) | to you |
| सः | तद् (१.१) | he, |
| नियम्य | नियम्य (नि√यम्+ल्यप्) | restricting |
| तान् | तद् (२.३) | them. |
| तत् | तद् | Yet |
| अपि | अपि | still, |
| तैः | तद् (३.३) | by them, |
| बत | बत | alas, |
| जर्जरितम् | जर्जरित (१.१) | is shattered |
| जगत् | जगत् (१.१) | the world. |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | पि | वि | धिः | कु | सु | मा | नि | त | वा | शु | गा |
| न्स्म | र | वि | धा | य | न | नि | र्वृ | ति | मा | प्त | वान् |
| अ | दि | त | प | ञ्च | हि | ते | स | नि | य | म्य | तां |
| स्त | द | पि | तै | र्ब | त | ज | र्ज | रि | तं | ज | गत् |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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