स्मररिपोरिव रोपशिखी पुरां
दहतु ते जगतामपि मा त्रयम् ।
इति विधिस्त्वदिषून्कुसुमानि किं
मधुभिरन्तरसिञ्चदनिर्वृतः ॥
स्मररिपोरिव रोपशिखी पुरां
दहतु ते जगतामपि मा त्रयम् ।
इति विधिस्त्वदिषून्कुसुमानि किं
मधुभिरन्तरसिञ्चदनिर्वृतः ॥
दहतु ते जगतामपि मा त्रयम् ।
इति विधिस्त्वदिषून्कुसुमानि किं
मधुभिरन्तरसिञ्चदनिर्वृतः ॥
अन्वयः
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ते रोषशिखी स्मररिपोः (रोषशिखी) इव पुरां जगतां त्रयम् अपि मा दहतु इति (विचार्य) अनिर्वृतः विधिः त्वदिषून् कुसुमानि अन्तः मधुभिः किम् असिञ्चत्?
Summary
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"Lest the fire of your anger, like that of Shiva's, burn not just cities but all three worlds, did the anxious Brahma drench your flower-arrows inside with honey?"
पदच्छेदः
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| स्मररिपोः | स्मर (६.१)–रिपु (६.१) | of Shiva (Kama's enemy) |
| इव | इव | like |
| रोषशिखी | रोष–शिखिन् (१.१) | the fire of anger |
| पुराम् | पुर (२.३) | cities |
| दहतु | दहतु (√दह् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | burn |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| जगताम् | जगत् (२.३) | worlds |
| अपि | अपि | also |
| मा | मा | let not |
| त्रयम् | त्रय (२.१) | the three |
| इति | इति | thus (thinking), |
| विधिः | विधि (१.१) | Brahma, |
| त्वदिषून् | तव–इषु (२.३) | your arrows, |
| कुसुमानि | कुसुम (२.३) | the flowers, |
| किम् | किम् | did |
| मधुभिः | मधु (३.३) | with honey |
| अन्तः | अन्तर् | inside |
| असिञ्चत् | असिञ्चत् (√सिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | drench, |
| अनिर्वृतः | अनिर्वृत (१.१) | anxious? |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | र | रि | पो | रि | व | रो | प | शि | खी | पु | रां |
| द | ह | तु | ते | ज | ग | ता | म | पि | मा | त्र | यम् |
| इ | ति | वि | धि | स्त्व | दि | षू | न्कु | सु | मा | नि | किं |
| म | धु | भि | र | न्त | र | सि | ञ्च | द | नि | र्वृ | तः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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