पुरभिदा गमितस्त्वमदृश्यतां
त्रिनयनत्वपरिप्लुतिशङ्कया ।
स्मर निरैष्यत कस्यचनापि न
त्वयि किमक्षिगते नयनैस्त्रिभिः ॥
पुरभिदा गमितस्त्वमदृश्यतां
त्रिनयनत्वपरिप्लुतिशङ्कया ।
स्मर निरैष्यत कस्यचनापि न
त्वयि किमक्षिगते नयनैस्त्रिभिः ॥
त्रिनयनत्वपरिप्लुतिशङ्कया ।
स्मर निरैष्यत कस्यचनापि न
त्वयि किमक्षिगते नयनैस्त्रिभिः ॥
अन्वयः
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स्मर ! पुरभिदा त्रिनयनत्वपरिप्लुतिशङ्कया त्वम् अदृश्यतां गमितः। (यदि तथा न अभविष्यत् तर्हि) त्वयि अक्षिगते (सति) कस्यचन अपि त्रिभिः नयनैः (दृष्ट्वा) किं न निरैष्यत?
Summary
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"O Kama! You were made invisible by Shiva out of fear of losing his three-eyed nature. For if you were visible, who, upon seeing you with three eyes, would not have been captivated?"
पदच्छेदः
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| पुरभिदा | पुरभिद् (३.१) | By Shiva (the destroyer of cities), |
| गमितः | गमित (√गम्+णिच्+क्त, १.१) | were made |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| अदृश्यताम् | अदृश्यता (२.१) | to attain invisibility |
| त्रिनयनत्वपरिप्लुतिशङ्कया | त्रि–नयन–त्व–परिप्लुति–शङ्का (३.१) | due to the fear of losing his three-eyed nature. |
| स्मर | स्मर (८.१) | O Kama! |
| निरैष्यत | निरैष्यत (निर्√इ कर्तरि लृङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | would not have been captivated? |
| कस्यचन | कश्चन (६.१) | anyone |
| अपि | अपि | at all |
| न | न | not |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | you, |
| किम् | किम् | who |
| अक्षिगते | अक्षिणी–गतः (७.१) | having come into sight, |
| नयनैः | नयन (३.३) | with eyes |
| त्रिभिः | त्रि (३.३) | three? |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | र | भि | दा | ग | मि | त | स्त्व | म | दृ | श्य | तां |
| त्रि | न | य | न | त्व | प | रि | प्लु | ति | श | ङ्क | या |
| स्म | र | नि | रै | ष्य | त | क | स्य | च | ना | पि | न |
| त्व | यि | कि | म | क्षि | ग | ते | न | य | नै | स्त्रि | भिः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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