इति विधोर्विविधोक्तिवगर्हणं
व्यवहितस्य वृथेति विमृश्य सा ।
अतितरां दधती विरहज्वरं
हृदयभाजमुपालभत स्मरम् ॥
इति विधोर्विविधोक्तिवगर्हणं
व्यवहितस्य वृथेति विमृश्य सा ।
अतितरां दधती विरहज्वरं
हृदयभाजमुपालभत स्मरम् ॥
व्यवहितस्य वृथेति विमृश्य सा ।
अतितरां दधती विरहज्वरं
हृदयभाजमुपालभत स्मरम् ॥
अन्वयः
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सा इति व्यवहितस्य विधोः विविधोक्तिवगर्हणं वृथा इति विमृश्य, अतितरां विरहज्वरं दधती, हृदयभाजं स्मरम् उपालभत।
Summary
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Realizing that censuring the distant moon with various words was futile, she (Damayanti), suffering intensely from the fever of separation, began to reproach Kama (Smara), who resided in her heart.
पदच्छेदः
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| इति | इति | Thus, |
| विधोः | विधु (६.१) | of the moon, |
| विविधोक्तिवगर्हणम् | विविध–उक्ति–वगर्हण (१.१) | censure with various words |
| व्यवहितस्य | व्यवहित (वि+अव√धा+क्त, ६.१) | who was distant, |
| वृथा | वृथा | was futile, |
| इति | इति | so |
| विमृश्य | विमृश्य (वि√मृश्+ल्यप्) | realizing, |
| सा | तद् (१.१) | she, |
| अतितराम् | अतितराम् | intensely |
| दधती | दधती (√धा+शतृ, १.१) | bearing |
| विरहज्वरम् | विरह (६.१)–ज्वर (२.१) | the fever of separation, |
| हृदयभाजम् | हृदयम्–भजति–इति–हृदयभाज् (२.१) | who resides in her heart, |
| उपालभत | उपालभत (उप+आ√लभ् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | reproached |
| स्मरम् | स्मर (२.१) | Kama. |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | वि | धो | र्वि | वि | धो | क्ति | व | ग | र्ह | णं |
| व्य | व | हि | त | स्य | वृ | थे | ति | वि | मृ | श्य | सा |
| अ | ति | त | रां | द | ध | ती | वि | र | ह | ज्व | रं |
| हृ | द | य | भा | ज | मु | पा | ल | भ | त | स्म | रम् |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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