नलविमस्तकितस्य रणे रिपोः
मिलति किं न कबन्धगलेन वा ।
मृतिभिया भृशमुत्पततस्तम्
आग्रहशिरस्तदसृग्दृढबन्धनम् ॥
नलविमस्तकितस्य रणे रिपोः
मिलति किं न कबन्धगलेन वा ।
मृतिभिया भृशमुत्पततस्तम्
आग्रहशिरस्तदसृग्दृढबन्धनम् ॥
मिलति किं न कबन्धगलेन वा ।
मृतिभिया भृशमुत्पततस्तम्
आग्रहशिरस्तदसृग्दृढबन्धनम् ॥
अन्वयः
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रणे नल-विमस्तकितस्य रिपोः (शिरः) कबन्ध-गलेन किम् न मिलति वा? मृति-भिया भृशम् उत्पततः (कबन्धस्य) तम् (गलं प्रति) आग्रह-शिरः (अस्ति), तत्-असृक्-दृढ-बन्धनम् (च अस्ति) ।
Summary
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"Or does the head of an enemy, beheaded by Nala in battle, not rejoin its own trunk? The head is eager to rejoin it, and the trunk leaps up violently from fear of death, while the blood forms a firm bond between them."
पदच्छेदः
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| नलविमस्तकितस्य | नल–विमस्तकित (६.१) | of the one beheaded by Nala |
| रणे | रण (७.१) | in battle |
| रिपोः | रिपु (६.१) | of an enemy |
| मिलति | मिलति (√मिल् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | does join |
| किम् | किम् | does |
| न | न | not |
| कबन्धगलेन | कबन्ध–गल (३.१) | with the neck of the trunk |
| वा | वा | or |
| मृतिभिया | मृति–भी (३.१) | from fear of death |
| भृशम् | भृशम् | violently |
| उत्पततः | उत्पतत् (उद्√पत्+शतृ, ६.१) | of the one leaping up |
| तम् | तद् (२.१) | it |
| आग्रहशिरः | आग्रह–शिरस् (१.१) | the head is eager |
| तदसृग्दृढबन्धनम् | तत्–असृज्–दृढ–बन्धन (१.१) | the firm bond of its blood |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | ल | वि | म | स्त | कि | त | स्य | र | णे | रि | पोः |
| मि | ल | ति | किं | न | क | ब | न्ध | ग | ले | न | वा |
| मृ | ति | भि | या | भृ | श | मु | त्प | त | त | स्त | मा |
| ग्र | ह | शि | र | स्त | द | सृ | ग्दृ | ढ | ब | न्ध | नम् |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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