स्वरिपुतीक्ष्णसुदर्शनविभ्रमा-
त्किमु विधुं ग्रसते स विधुंतुदः ।
निपतितं वदने कथमन्यथा
बलिकरम्भनिभं निजमुज्झति ॥
स्वरिपुतीक्ष्णसुदर्शनविभ्रमा-
त्किमु विधुं ग्रसते स विधुंतुदः ।
निपतितं वदने कथमन्यथा
बलिकरम्भनिभं निजमुज्झति ॥
त्किमु विधुं ग्रसते स विधुंतुदः ।
निपतितं वदने कथमन्यथा
बलिकरम्भनिभं निजमुज्झति ॥
अन्वयः
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सः विधुंतुदः स्व-रिपु-तीक्ष्ण-सुदर्शन-विभ्रमात् किमु विधुम् ग्रसते? अन्यथा वदने निपतितम् बलि-करम्भ-निभम् निजम् (आहारम्) कथम् उज्झति?
Summary
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"Does Rahu swallow the moon under the delusion that it is the sharp Sudarshana discus of his enemy, Vishnu? Otherwise, why would he release from his mouth his own food, which has fallen into it and resembles a ball of sacrificial rice?"
पदच्छेदः
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| स्वरिपुतीक्ष्णसुदर्शनविभ्रमात् | स्व–रिपु–तीक्ष्ण–सुदर्शन–विभ्रम (५.१) | due to the delusion that it is the sharp Sudarshana discus of his enemy |
| किमु | किम्–उ | is it that |
| विधुम् | विधु (२.१) | the moon |
| ग्रसते | ग्रसते (√ग्रस् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | swallows |
| सः | तद् (१.१) | he |
| विधुंतुदः | विधुम्–तुद (१.१) | the moon-tormentor (Rahu) |
| निपतितम् | निपतित (नि√पत्+क्त, २.१) | fallen |
| वदने | वदन (७.१) | in his mouth |
| कथम् | कथम् | how |
| अन्यथा | अन्यथा | otherwise |
| बलिकरम्भनिभम् | बलि–करम्भ–निभ (२.१) | resembling a ball of sacrificial rice |
| निजम् | निज (२.१) | his own (food) |
| उज्झति | उज्झति (√उझ्झ् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | does he release |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्व | रि | पु | ती | क्ष्ण | सु | द | र्श | न | वि | भ्र | मा |
| त्कि | मु | वि | धुं | ग्र | स | ते | स | वि | धुं | तु | दः |
| नि | प | ति | तं | व | द | ने | क | थ | म | न्य | था |
| ब | लि | क | र | म्भ | नि | भं | नि | ज | मु | ज्झ | ति |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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