असितमेकसुराशितमप्यभू-
न्न पुनरेष विधुर्विशदं विषम् ।
अपि निपीय सुरैर्जनितक्षयं
स्वयमुदेति पुनर्नवमार्णवम् ॥
असितमेकसुराशितमप्यभू-
न्न पुनरेष विधुर्विशदं विषम् ।
अपि निपीय सुरैर्जनितक्षयं
स्वयमुदेति पुनर्नवमार्णवम् ॥
न्न पुनरेष विधुर्विशदं विषम् ।
अपि निपीय सुरैर्जनितक्षयं
स्वयमुदेति पुनर्नवमार्णवम् ॥
अन्वयः
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(यत्) एक-सुर-अशितम् असितम् विषम् (आसीत्), तत् पुनः न अभूत् । एषः विधुः (तु) विशदम् विषम् (अस्ति) । (सः) सुरैः निपीय जनित-क्षयम् (अपि) पुनः स्वयम् आर्णवात् नवम् उदेति ।
Summary
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The dark poison, eaten by a single god (Shiva), never appeared again. But this moon is a white poison. Though consumed by the gods and made to wane, it rises again, new, from the ocean.
पदच्छेदः
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| असितम् | असित (१.१) | the dark |
| एकसुराशितम् | एक–सुर–अशित (√अश्+क्त, १.१) | eaten by a single god |
| अपि | अपि | even |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| न | न | not |
| पुनः | पुनर् | again |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| विधुः | विधु (१.१) | moon |
| विशदम् | विशद (१.१) | white |
| विषम् | विष (१.१) | poison |
| अपि | अपि | also |
| निपीय | निपीय (नि√पा+ल्यप्) | having been drunk |
| सुरैः | सुर (३.३) | by the gods |
| जनितक्षयम् | जनित (√जन्+णिच्+क्त)–क्षय (२.१) | made to wane |
| स्वयम् | स्वयम् | itself |
| उदेति | उदेति (उद्√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | rises |
| पुनः | पुनर् | again |
| नवम् | नव (२.१) | new |
| आर्णवात् | आर्णव (५.१) | from the ocean |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | सि | त | मे | क | सु | रा | शि | त | म | प्य | भू |
| न्न | पु | न | रे | ष | वि | धु | र्वि | श | दं | वि | षम् |
| अ | पि | नि | पी | य | सु | रै | र्ज | नि | त | क्ष | यं |
| स्व | य | मु | दे | ति | पु | न | र्न | व | मा | र्ण | वम् |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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