विरहपाण्डुकपोलतले विधुः
व्यधित भीमभुवः प्रतिबिम्बितः ।
अनुपलक्ष्यसितांशुतया मुखं
निजसखं सुखमङ्कमृगार्पणात् ॥
विरहपाण्डुकपोलतले विधुः
व्यधित भीमभुवः प्रतिबिम्बितः ।
अनुपलक्ष्यसितांशुतया मुखं
निजसखं सुखमङ्कमृगार्पणात् ॥
व्यधित भीमभुवः प्रतिबिम्बितः ।
अनुपलक्ष्यसितांशुतया मुखं
निजसखं सुखमङ्कमृगार्पणात् ॥
अन्वयः
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भीमभुवः विरहपाण्डुकपोलतले प्रतिबिम्बितः विधुः, अनुपलक्ष्य-सित-अंशुतया, निजसखं मुखम् अङ्कमृगार्पणात् सुखं व्यधित ।
Summary
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The moon, reflected on Damayanti's cheek made pale by separation, made its friend, her face, happy. Because her cheek was so pale, the moon's white rays were not discernible, making it seem as if the moon had offered its own dark spot (the deer) to her face, thus pleasing it.
पदच्छेदः
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| विरहपाण्डुकपोलतले | विरह–पाण्डु–कपोल–तल (७.१) | on the surface of her cheek, pale from separation |
| विधुः | विधु (१.१) | the moon |
| व्यधित | व्यधित (वि√धा कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made |
| भीमभुवः | भीमभू (६.१) | of Bhima's daughter |
| प्रतिबिम्बितः | प्रतिबिम्बित (प्रति√बिम्ब्+क्त, १.१) | reflected |
| अनुपलक्ष्यसितांशुतया | अनुपलक्ष्य–सित–अंशुता (३.१) | due to its white rays not being perceived |
| मुखम् | मुख (२.१) | the face |
| निजसखम् | निज–सखि (२.१) | its own friend |
| सुखम् | सुखम् | happily |
| अङ्कमृगार्पणात् | अङ्क–मृग–अर्पण (५.१) | from offering the deer in its lap |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | र | ह | पा | ण्डु | क | पो | ल | त | ले | वि | धुः |
| व्य | धि | त | भी | म | भु | वः | प्र | ति | बि | म्बि | तः |
| अ | नु | प | ल | क्ष्य | सि | तां | शु | त | या | मु | खं |
| नि | ज | स | खं | सु | ख | म | ङ्क | मृ | गा | र्प | णात् |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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