रिपुतरा भवनादविनिर्यतीं
विधुरुचिर्गृहजालबिलैर्नु ताम् ।
इतरथात्मनिवारणशङ्कया
ज्वरयितुं विशवेशधराविशत् ॥
रिपुतरा भवनादविनिर्यतीं
विधुरुचिर्गृहजालबिलैर्नु ताम् ।
इतरथात्मनिवारणशङ्कया
ज्वरयितुं विशवेशधराविशत् ॥
विधुरुचिर्गृहजालबिलैर्नु ताम् ।
इतरथात्मनिवारणशङ्कया
ज्वरयितुं विशवेशधराविशत् ॥
अन्वयः
AI
रिपुतरा विधुरुचिः भवनात् अविनिर्यतीं तां ज्वरयितुं, इतरथा आत्मनिवारणशङ्कया, विषवेषधरा (सती) गृहजालबिलैः अविशत् नु ।
Summary
AI
The moonlight, acting more hostile than an enemy, sought to torment Damayanti, who remained inside her palace. Fearing it would otherwise be blocked, it entered through the lattice windows, as if disguised as poison, to inflict its fever upon her.
पदच्छेदः
AI
| रिपुतरा | रिपुतरा (१.१) | more hostile |
| भवनात् | भवन (५.१) | from the palace |
| अविनिर्यतीम् | अविनिर्यती (अ+वि+निस्√या+शतृ+ङीप्, २.१) | the one not going out |
| विधुरुचिः | विधुरुचि (१.१) | the moonlight |
| गृहजालबिलैः | गृह–जाल–बिल (३.३) | through the openings of the lattice windows |
| नु | नु | surely |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
| इतरथा | इतरथा | otherwise |
| आत्मनिवारणशङ्कया | आत्म–निवारण–शङ्का (३.१) | with the fear of its own prevention |
| ज्वरयितुम् | ज्वरयितुम् (√ज्वर्+णिच्+तुमुन्) | to cause fever |
| विषवेषधरा | विष–वेष–धरा (१.१) | assuming the guise of poison |
| अविशत् | अविशत् (√विश् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | entered |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रि | पु | त | रा | भ | व | ना | द | वि | नि | र्य | तीं |
| वि | धु | रु | चि | र्गृ | ह | जा | ल | बि | लै | र्नु | ताम् |
| इ | त | र | था | त्म | नि | वा | र | ण | श | ङ्क | या |
| ज्व | र | यि | तुं | वि | श | वे | श | ध | रा | वि | शत् |
| न | भ | भ | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.