अनलभावमियं स्वनिवासिनो
न विरहस्य रहस्यमबुध्यत ।
प्रशमनाय विधाय तृणान्यसू-
ञ्ज्वलति तत्र यदुज्झितुमैहत ॥
अनलभावमियं स्वनिवासिनो
न विरहस्य रहस्यमबुध्यत ।
प्रशमनाय विधाय तृणान्यसू-
ञ्ज्वलति तत्र यदुज्झितुमैहत ॥
न विरहस्य रहस्यमबुध्यत ।
प्रशमनाय विधाय तृणान्यसू-
ञ्ज्वलति तत्र यदुज्झितुमैहत ॥
अन्वयः
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इयं स्वनिवासिनः विरहस्य अनलभावं रहस्यं न अबुध्यत, यत् तत्र ज्वलति (विरहे) प्रशमनाय असून् तृणानि विधाय उज्झितुम् ऐहत ।
Summary
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She did not understand the secret fiery nature of the separation residing within her. For, she desired to quench that burning fire by throwing her life-breaths into it, treating them like mere straw, which would only fuel the flames further.
पदच्छेदः
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| अनलभावम् | अनल–भाव (२.१) | the nature of fire |
| इयम् | इदम् (१.१) | she |
| स्वनिवासिनः | स्व–निवासिन् (६.१) | of the one residing in her |
| न | न | not |
| विरहस्य | विरह (६.१) | of separation |
| रहस्यम् | रहस्य (२.१) | secret |
| अबुध्यत | अबुध्यत (√बुध् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | did understand |
| प्रशमनाय | प्रशमन (४.१) | for quenching |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | having considered |
| तृणानि | तृण (२.३) | as straw |
| असून् | असु (२.३) | life breaths |
| ज्वलति | ज्वलत् (७.१) | in the burning |
| तत्र | तत्र | in that |
| यत् | यद् | because |
| उज्झितुम् | उज्झितुम् (√उझ्झ्+तुमुन्) | to abandon |
| ऐहत | ऐहत (√ईह् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | she desired |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | न | ल | भा | व | मि | यं | स्व | नि | वा | सि | नो |
| न | वि | र | ह | स्य | र | ह | स्य | म | बु | ध्य | त |
| प्र | श | म | ना | य | वि | धा | य | तृ | णा | न्य | सू |
| ञ्ज्व | ल | ति | त | त्र | य | दु | ज्झि | तु | मै | ह | त |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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