विधुरमानि तया यदि भानुमा-
न्कथमहो स तु तद्धृदयं तथा ।
अपि वियोगभरास्फुटनस्फुटी-
कृतदृषत्त्वमजिज्वलदंशुभिः ॥
विधुरमानि तया यदि भानुमा-
न्कथमहो स तु तद्धृदयं तथा ।
अपि वियोगभरास्फुटनस्फुटी-
कृतदृषत्त्वमजिज्वलदंशुभिः ॥
न्कथमहो स तु तद्धृदयं तथा ।
अपि वियोगभरास्फुटनस्फुटी-
कृतदृषत्त्वमजिज्वलदंशुभिः ॥
अन्वयः
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यदि तया विधुरम् आनि, अहो! तु सः भानुमान् वियोगभर-अस्फुटन-स्फुटीकृत-दृषत्त्वं तद्धृदयं तथा कथम् अंशुभिः अजिज्वलत्?
Summary
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If she considered even the cool moon to be painful, oh, how then did the actual sun so intensely burn her heart with its rays—a heart whose stoniness was proven by the very fact that it hadn't already burst from the weight of her sorrow?
पदच्छेदः
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| विधुरम् | विधुर (२.१) | the moon (as painful) |
| आनि | आनि (आ√नी कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was considered/brought |
| तया | तद् (३.१) | by her |
| यदि | यदि | if |
| भानुमान् | भानुमत् (१.१) | the sun |
| कथम् | कथम् | how |
| अहो | अहो | oh! |
| सः | तद् (१.१) | he |
| तु | तु | but |
| तद्धृदयम् | तद्–हृदय (२.१) | her heart |
| तथा | तथा | so |
| अपि | अपि | also |
| वियोगभरास्फुटनस्फुटीकृतदृषत्त्वम् | वियोग–भर–अस्फुटन–स्फुटीकृत–दृषत्त्व (२.१) | whose stoniness was made clear by its not bursting from the weight of separation |
| अजिज्वलत् | अजिज्वलत् (√ज्वल् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made it burn |
| अंशुभिः | अंशु (३.३) | with rays |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | धु | र | मा | नि | त | या | य | दि | भा | नु | मा |
| न्क | थ | म | हो | स | तु | त | द्धृ | द | यं | त | था |
| अ | पि | वि | यो | ग | भ | रा | स्फु | ट | न | स्फु | टी |
| कृ | त | दृ | ष | त्त्व | म | जि | ज्व | ल | दं | शु | भिः |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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