उदयति स्म तदद्भुतमालिभिः
धरणिभृद्भुवि तत्र विमृश्य यत् ।
अनुमितोऽपि च बाष्पनिरीक्षणा-
द्द्व्यविभिचचार न तापकरो नलः ॥
उदयति स्म तदद्भुतमालिभिः
धरणिभृद्भुवि तत्र विमृश्य यत् ।
अनुमितोऽपि च बाष्पनिरीक्षणा-
द्द्व्यविभिचचार न तापकरो नलः ॥
धरणिभृद्भुवि तत्र विमृश्य यत् ।
अनुमितोऽपि च बाष्पनिरीक्षणा-
द्द्व्यविभिचचार न तापकरो नलः ॥
अन्वयः
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तत्र धरणिभृद्भुवि आलिभिः विमृश्य यत् अद्भुतं तत् उदयति स्म । च बाष्पनिरीक्षणात् अनुमितः अपि तापकरः नलः न व्यभिचचार ।
Summary
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Her friends, observing the princess, were struck by a wonder they pondered over: although Nala's presence was only inferred from her tearful gaze, the heat he caused in her was undeniably real and never wavered.
पदच्छेदः
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| उदयति | उदयति (उद्√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | arises |
| स्म | स्म | (past tense marker) |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| अद्भुतम् | अद्भुत (१.१) | wonder |
| आलिभिः | आलि (३.३) | by the friends |
| धरणिभृद्भुवि | धरणिभृत्–भू (७.१) | in the daughter of the king |
| तत्र | तत्र | there |
| विमृश्य | विमृश्य (वि√मृश्+ल्यप्) | having considered |
| यत् | यद् (१.१) | that which |
| अनुमितः | अनुमित (अनु√मा+क्त, १.१) | inferred |
| अपि | अपि | even |
| च | च | and |
| बाष्पनिरीक्षणात् | बाष्प–निरीक्षण (५.१) | from seeing the tears |
| व्यभिचचार | व्यभिचचार (वि+अभि√चर् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | did deviate |
| न | न | not |
| तापकरः | तापकर (१.१) | causing heat |
| नलः | नल (१.१) | Nala |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | द | य | ति | स्म | त | द | द्भु | त | मा | लि | भिः | |
| ध | र | णि | भृ | द्भु | वि | त | त्र | वि | मृ | श्य | यत् | |
| अ | नु | मि | तो | ऽपि | च | बा | ष्प | नि | री | क्ष | णा | |
| द्द्व्य | वि | भि | च | चा | र | न | ता | प | क | रो | न | लः |
| न | भ | भ | र | |||||||||
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