सुहृदमग्निमुदञ्चयितुं स्मरं
मनसि गन्धवहेन मृगीदृशः ।
अकलि निःश्वसितेन विनिर्गमा-
नुमितनिह्नुतवेशनमायिता ॥
सुहृदमग्निमुदञ्चयितुं स्मरं
मनसि गन्धवहेन मृगीदृशः ।
अकलि निःश्वसितेन विनिर्गमा-
नुमितनिह्नुतवेशनमायिता ॥
मनसि गन्धवहेन मृगीदृशः ।
अकलि निःश्वसितेन विनिर्गमा-
नुमितनिह्नुतवेशनमायिता ॥
अन्वयः
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मृगीदृशः मनसि सुहृदं स्मरम् अग्निम् उदञ्चयितुम् आयिना गन्धवहेन विनिर्गम-अनुमित-निह्नुत-वेशनं (यथा स्यात् तथा प्रविष्टम् इति) निःश्वसितेन अकलि ।
Summary
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The wind, a friend to the fire of love, secretly entered the mind of the deer-eyed Damayanti to kindle it further. Its concealed entry was inferred only by its exit in the form of her hot sighs.
पदच्छेदः
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| सुहृदम् | सुहृद् (२.१) | friend |
| अग्निम् | अग्नि (२.१) | the fire |
| उदञ्चयितुम् | उदञ्चयितुम् (उद्√अञ्च्+णिच्+तुमुन्) | to kindle |
| स्मरम् | स्मर (२.१) | of love |
| मनसि | मनस् (७.१) | in the mind |
| गन्धवहेन | गन्धवह (३.१) | by the wind |
| मृगीदृशः | मृगीदृश् (६.१) | of the deer-eyed one |
| अकलि | अकलि (√कॄ +णिच्+चिण् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was perceived |
| निःश्वसितेन | निःश्वसित (३.१) | by the sigh |
| विनिर्गमानुमितनिह्नुतवेशनम् | विनिर्गम–अनुमित–निह्नुत–वेशन (२.१) | whose concealed entry was inferred from its exit |
| आयिना | आयिन् (३.१) | by the one who comes |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सु | हृ | द | म | ग्नि | मु | द | ञ्च | यि | तुं | स्म | रं |
| म | न | सि | ग | न्ध | व | हे | न | मृ | गी | दृ | शः |
| अ | क | लि | निः | श्व | सि | ते | न | वि | नि | र्ग | मा |
| नु | मि | त | नि | ह्नु | त | वे | श | न | मा | यि | ता |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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