एवं यद्वदता नृपेण तनया नापृच्छि लज्जास्पदं
यन्मोहः स्मरभूरकल्पि वपुषः पाण्डुत्वतापादिभिः ।
यच्चाशीः कपटादवादि सदृशी स्यात्तत्र या सान्त्वना
तन्मत्यालिजनो मनोब्धिमतनोदानन्दमन्दाक्षयोः ॥
एवं यद्वदता नृपेण तनया नापृच्छि लज्जास्पदं
यन्मोहः स्मरभूरकल्पि वपुषः पाण्डुत्वतापादिभिः ।
यच्चाशीः कपटादवादि सदृशी स्यात्तत्र या सान्त्वना
तन्मत्यालिजनो मनोब्धिमतनोदानन्दमन्दाक्षयोः ॥
यन्मोहः स्मरभूरकल्पि वपुषः पाण्डुत्वतापादिभिः ।
यच्चाशीः कपटादवादि सदृशी स्यात्तत्र या सान्त्वना
तन्मत्यालिजनो मनोब्धिमतनोदानन्दमन्दाक्षयोः ॥
अन्वयः
AI
एवम् वदता नृपेण यत् तनया लज्जास्पदम् न अपृच्छि, यत् वपुषः पाण्डुत्वतापादिभिः मोहः स्मरभूः अकल्पि, यत् च कपटात् सदृशी आशीः अवादि, तत्र या सान्त्वना स्यात्, तत् मत्या आलिजनः आनन्दमन्दाक्षयोः मनोब्धिम् अतनोत् ।
Summary
AI
Because the speaking king did not ask his daughter an embarrassing question, because he attributed her fainting to her body's paleness and fever, and because he gave a suitable blessing under a pretext—this constituted a great consolation. Understanding this, the group of friends expanded the ocean of their minds, which was filled with both joy and bashfulness.
पदच्छेदः
AI
| एवम् | एवम् | Thus |
| यत् | यद् | that |
| वदता | वदत् (√वद्+शतृ, ३.१) | by the speaking |
| नृपेण | नृप (३.१) | king |
| तनया | तनया (१.१) | the daughter |
| न | न | not |
| अपृच्छि | अपृच्छि (√प्रच्छ् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was asked |
| लज्जास्पदम् | लज्जास्पद (२.१) | an embarrassing thing |
| यत् | यद् | that |
| मोहः | मोह (१.१) | the fainting |
| स्मरभूः | स्मरभू (१.१) | born of love |
| अकल्पि | अकल्पि (√कॢप् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was supposed/attributed |
| वपुषः | वपुस् (६.१) | of the body's |
| पाण्डुत्वतापादिभिः | पाण्डुत्वतापादि (३.३) | to paleness, fever, etc. |
| यत् | यद् | that |
| च | च | and |
| आशीः | आशिस् (१.१) | a blessing |
| कपटात् | कपट (५.१) | from pretext |
| अवादि | अवादि (√वद् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was spoken |
| सदृशी | सदृशी (१.१) | suitable |
| स्यात् | स्यात् (√अस् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would be |
| तत्र | तत्र | in that |
| या | यद् (१.१) | which |
| सान्त्वना | सान्त्वना (१.१) | consolation |
| तत् | तत् | that |
| मत्या | मति (३.१) | by understanding |
| आलिजनः | आलिजन (१.१) | the group of friends |
| मनोब्धिम् | मनोब्धि (२.१) | the ocean of the mind |
| अतनोत् | अतनोत् (√तन् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | expanded |
| आनन्दमन्दाक्षयोः | आनन्दमन्दाक्ष (६.२) | of joy and bashfulness |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | वं | य | द्व | द | ता | नृ | पे | ण | त | न | या | ना | पृ | च्छि | ल | ज्जा | स्प | दं |
| य | न्मो | हः | स्म | र | भू | र | क | ल्पि | व | पु | षः | पा | ण्डु | त्व | ता | पा | दि | भिः |
| य | च्चा | शीः | क | प | टा | द | वा | दि | स | दृ | शी | स्या | त्त | त्र | या | सा | न्त्व | ना |
| त | न्म | त्या | लि | ज | नो | म | नो | ब्धि | म | त | नो | दा | न | न्द | म | न्दा | क्ष | योः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.