ताभ्यामभूद्युगपदप्यभिधीयमानं
भेदव्यपाकृति मिथःप्रतिघातमेव ।
श्रोत्रे तु तस्य पपतुर्नृपतेर्न किंचि-
द्भैम्यामनिष्टशतशङ्कितयाकुलस्य ॥
ताभ्यामभूद्युगपदप्यभिधीयमानं
भेदव्यपाकृति मिथःप्रतिघातमेव ।
श्रोत्रे तु तस्य पपतुर्नृपतेर्न किंचि-
द्भैम्यामनिष्टशतशङ्कितयाकुलस्य ॥
भेदव्यपाकृति मिथःप्रतिघातमेव ।
श्रोत्रे तु तस्य पपतुर्नृपतेर्न किंचि-
द्भैम्यामनिष्टशतशङ्कितयाकुलस्य ॥
अन्वयः
AI
ताभ्याम् युगपत् अपि अभिधीयमानम् (वचनम्) भेदव्यपाकृति (सत्) मिथः प्रतिघातम् एव अभूत् । तु भैभ्याम् अनिष्टशतशङ्कितया आकुलस्य तस्य नृपतेः श्रोत्रे किंचित् न पपतुः ।
Summary
AI
Although spoken simultaneously by both, their words, lacking distinction, simply cancelled each other out. Nothing entered the ears of the king, who was agitated by the fear of a hundred misfortunes befalling Damayanti.
पदच्छेदः
AI
| ताभ्याम् | तद् (३.२) | by those two |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| युगपत् | युगपत् | simultaneously |
| अपि | अपि | even |
| अभिधीयमानम् | अभिधीयमान (अभि√धा+यक्+शानच्, १.१) | being spoken |
| भेदव्यपाकृति | भेदव्यपाकृति (१.१) | lacking distinction |
| मिथः | मिथः | mutually |
| प्रतिघातम् | प्रतिघात (१.१) | cancelling out |
| एव | एव | only |
| श्रोत्रे | श्रोत्र (७.१) | in the ear |
| तु | तु | but |
| तस्य | तद् (६.१) | of that |
| पपतुः | पपतुः (√पत् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. द्वि.) | did fall |
| नृपतेः | नृपति (६.१) | of the king |
| न | न | not |
| किंचित् | किंचित् | anything |
| भैम्याम् | भैमी (७.१) | regarding Bhaimi (Damayanti) |
| अनिष्टशतशङ्कितया | अनिष्टशतशङ्किता (३.१) | by the fear of a hundred misfortunes |
| आकुलस्य | आकुल (६.१) | of the agitated |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | भ्या | म | भू | द्यु | ग | प | द | प्य | भि | धी | य | मा | नं |
| भे | द | व्य | पा | कृ | ति | मि | थः | प्र | ति | घा | त | मे | व |
| श्रो | त्रे | तु | त | स्य | प | प | तु | र्नृ | प | ते | र्न | किं | चि |
| द्भै | म्या | म | नि | ष्ट | श | त | श | ङ्कि | त | या | कु | ल | स्य |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.