अथ नलस्य गुणं गुणमात्मभूः
सुरभि तस्य यशः कुसुमं धनुः ।
श्रुतिपथोपगतं सुमनस्तया
तमिषुमाशु विधाय जिगाय ताम् ॥
अथ नलस्य गुणं गुणमात्मभूः
सुरभि तस्य यशः कुसुमं धनुः ।
श्रुतिपथोपगतं सुमनस्तया
तमिषुमाशु विधाय जिगाय ताम् ॥
सुरभि तस्य यशः कुसुमं धनुः ।
श्रुतिपथोपगतं सुमनस्तया
तमिषुमाशु विधाय जिगाय ताम् ॥
अन्वयः
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अथ आत्मभूः नलस्य गुणम् गुणम् (कृत्वा), तस्य सुरभि यशः कुसुमम् (कृत्वा), (स्वकीयं) धनुः (आदाय), श्रुति-पथ-उपगतम् तम् (नलम्) सुमनस्तया इषुम् विधाय, आशु ताम् जिगाय।
Summary
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Then Kama, using Nala's virtue as his bowstring and his fragrant fame as the flower for his bow, fashioned Nala himself—who had entered her ears—into an arrow by virtue of his noble mind, and swiftly conquered her.
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | Then |
| नलस्य | नल (६.१) | Nala's |
| गुणम् | गुण (२.१) | virtue |
| गुणम् | गुण (२.१) | as the bowstring |
| आत्मभूः | आत्मभू (१.१) | Kama |
| सुरभि | सुरभि (२.१) | fragrant |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| यशः | यशस् (२.१) | fame |
| कुसुमम् | कुसुम (२.१) | as the flower |
| धनुः | धनुस् (२.१) | his bow |
| श्रुति-पथ-उपगतम् | श्रुतिपथोपगत (२.१) | who had entered the path of her ear |
| सुमनस्तया | सुमनस्तस् (३.१) | by his good-heartedness/flower-like nature |
| तम् | तद् (२.१) | him (Nala) |
| इषुम् | इषु (२.१) | as the arrow |
| आशु | आशु | quickly |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | having made |
| जिगाय | जिगाय (√जि कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | conquered |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | न | ल | स्य | गु | णं | गु | ण | मा | त्म | भूः |
| सु | र | भि | त | स्य | य | शः | कु | सु | मं | ध | नुः |
| श्रु | ति | प | थो | प | ग | तं | सु | म | न | स्त | या |
| त | मि | षु | मा | शु | वि | धा | य | जि | गा | य | ताम् |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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