इत्युक्तवत्या यदलोपि लज्जा
सानौचिती चेतसि नश्चकास्तु ।
स्मरस्तु साक्षी तददोषतायाम्
उन्माद्य यस्तत्तदवीवदत्ताम् ॥
इत्युक्तवत्या यदलोपि लज्जा
सानौचिती चेतसि नश्चकास्तु ।
स्मरस्तु साक्षी तददोषतायाम्
उन्माद्य यस्तत्तदवीवदत्ताम् ॥
सानौचिती चेतसि नश्चकास्तु ।
स्मरस्तु साक्षी तददोषतायाम्
उन्माद्य यस्तत्तदवीवदत्ताम् ॥
अन्वयः
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इति उक्तवत्या (मया) यत् लज्जा अलोपि, सा अनौचिती नः चेतसि मा चकास्तु। तु यः स्मरः ताम् उन्माद्य तत् तत् अवीवदत्, सः तत्-अदोषतायाम् साक्षी (अस्ति)।
Summary
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The poet speaks: "Let the impropriety of her abandoning modesty by speaking thus not appear in your mind. For Kama (the god of love) is the witness to its faultlessness, as it was he who, having maddened her, made her speak all these things."
पदच्छेदः
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| इति | इति | thus |
| उक्तवत्या | उक्तवत् (√वच्+क्तवतु, ३.१) | by her who has spoken |
| यत् | यद् (१.१) | that |
| अलोपि | अलोपि (√लुप् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was abandoned |
| लज्जा | लज्जा (१.१) | modesty |
| सा | तद् (१.१) | that |
| अनौचिती | अनौचिती (१.१) | impropriety |
| चेतसि | चेतस् (७.१) | in the mind |
| नः | अस्मद् (६.३) | your |
| चकास्तु | चकास्तु (√चकास् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it shine |
| स्मरः | स्मर (१.१) | Kama |
| तु | तु | but |
| साक्षी | साक्षिन् (१.१) | witness |
| तददोषतायाम् | तद्–अदोषता (७.१) | in its faultlessness |
| उन्माद्य | उन्माद्य (उद्√मद्+णिच्+ल्यप्) | having maddened |
| यः | यद् (१.१) | who |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| अवीवदत् | अवीवदत् (√वद् +णिच् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made her speak |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्यु | क्त | व | त्या | य | द | लो | पि | ल | ज्जा |
| सा | नौ | चि | ती | चे | त | सि | न | श्च | का | स्तु |
| स्म | र | स्तु | सा | क्षी | त | द | दो | ष | ता | या |
| मु | न्मा | द्य | य | स्त | त्त | द | वी | व | द | त्ताम् |
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