शस्ता न हंसाभिमुखी पुनस्ते
यात्रेति ताभिश्छलहस्यमाना ।
साह स्म नैवाशकुनीभवेन्मे
भाविप्रियावेदक एष हंसः ॥
शस्ता न हंसाभिमुखी पुनस्ते
यात्रेति ताभिश्छलहस्यमाना ।
साह स्म नैवाशकुनीभवेन्मे
भाविप्रियावेदक एष हंसः ॥
यात्रेति ताभिश्छलहस्यमाना ।
साह स्म नैवाशकुनीभवेन्मे
भाविप्रियावेदक एष हंसः ॥
अन्वयः
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"ते पुनः हंस-अभिमुखी यात्रा न शस्ता" इति ताभिः छल-हस्यमाना सा आह स्म, "एषः हंसः मे भावि-प्रिय-आवेदकः (अस्ति), (अतः) न एव अशकुनीभवेत्।"
Summary
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Being mockingly laughed at by her friends who said, "Your pursuit of the swan again is not auspicious," she replied, "This swan is a messenger of my future beloved; therefore, it cannot be an ill omen for me."
पदच्छेदः
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| शस्ता | शस्त (√शंस्+क्त, १.१) | is auspicious |
| न | न | not |
| हंस-अभिमुखी | हंस–अभिमुखी | facing the swan |
| पुनः | पुनर् | again |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| यात्रा | यात्रा (१.१) | pursuit |
| इति | इति | thus |
| ताभिः | तद् (३.३) | by them |
| छल-हस्यमाना | छल–हस्यमान (√हस्+यक्+शानच्, १.१) | being laughed at deceitfully |
| सा | तद् (१.१) | she |
| आह स्म | आह (√अह् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.)–स्म | said |
| न | न | not |
| एव | एव | at all |
| अशकुनीभवेत् | भवेत् (अशकुनी√भू कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would become an ill omen |
| मे | अस्मद् (६.१) | for me |
| भावि-प्रिय-आवेदकः | भाविन्–प्रिय–आवेदक (१.१) | a messenger of my future beloved |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| हंसः | हंस (१.१) | swan |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श | स्ता | न | हं | सा | भि | मु | खी | पु | न | स्ते |
| या | त्रे | ति | ता | भि | श्छ | ल | ह | स्य | मा | ना |
| सा | ह | स्म | नै | वा | श | कु | नी | भ | वे | न्मे |
| भा | वि | प्रि | या | वे | द | क | ए | ष | हं | सः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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