दत्त्वात्मजीवं त्वयि जीवदेऽपि
शुध्यामि जीवाधिकदे तु केन ।
विधेहि तन्मां त्वदृणान्यशोद्धुम्
अमुद्रदारिद्र्यसमुद्रमग्नाम् ॥
दत्त्वात्मजीवं त्वयि जीवदेऽपि
शुध्यामि जीवाधिकदे तु केन ।
विधेहि तन्मां त्वदृणान्यशोद्धुम्
अमुद्रदारिद्र्यसमुद्रमग्नाम् ॥
शुध्यामि जीवाधिकदे तु केन ।
विधेहि तन्मां त्वदृणान्यशोद्धुम्
अमुद्रदारिद्र्यसमुद्रमग्नाम् ॥
अन्वयः
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त्वयि जीवदे अपि आत्मजीवं दत्त्वा (अहम्) शुध्यामि, तु जीव-अधिक-दे (त्वयि) केन (शुध्यामि)? तत् त्वत्-ऋणानि अशोद्धुम् अमुद्र-दारिद्र्य-समुद्र-मग्नाम् माम् विधेहि।
Summary
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Damayanti says to the swan: "By giving my life to you, a life-giver, I can repay my debt. But how can I repay you, who give more than life? Therefore, make me capable of repaying your debts, for I am drowned in the boundless ocean of poverty (of means to repay you)."
पदच्छेदः
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| दत्त्वा | दत्त्वा (√दा+क्त्वा) | having given |
| आत्मजीवम् | आत्मन्–जीव (२.१) | my own life |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | to you |
| जीवदे | जीव–द (√दा+क)–जीवद (७.१) | to the one who gives life |
| अपि | अपि | even |
| शुध्यामि | शुध्यामि (√शुध् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I become free from debt |
| जीवाधिकदे | जीव–अधिक–द (√दा+क)–जीवाधिकद (७.१) | to one who gives more than life |
| तु | तु | but |
| केन | किम् (३.१) | by what means |
| विधेहि | विधेहि (वि√धा कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | make |
| तत् | तत् | therefore |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| त्वदृणानि | युष्मद्–ऋण (२.३) | your debts |
| अशोद्धुम् | नञ्–शोद्धुम् (√शुध्+तुमुन्) | unable to repay |
| अमुद्रदारिद्र्यसमुद्रमग्नाम् | अमुद्र–दारिद्र्य–समुद्र–मग्न (√मज्ज्+क्त, २.१) | drowned in the ocean of boundless poverty |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | त्त्वा | त्म | जी | वं | त्व | यि | जी | व | दे | ऽपि |
| शु | ध्या | मि | जी | वा | धि | क | दे | तु | के | न |
| वि | धे | हि | त | न्मां | त्व | दृ | णा | न्य | शो | द्धु |
| म | मु | द्र | दा | रि | द्र्य | स | मु | द्र | म | ग्नाम् |
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