इतीरयित्वा विरराम पत्री
स राजपुत्रीहृदयं बुभुत्सुः ।
ह्रदे गभीरे हृदि चावगाढे
शंसन्ति कार्यावतरं हि सन्तः ॥
इतीरयित्वा विरराम पत्री
स राजपुत्रीहृदयं बुभुत्सुः ।
ह्रदे गभीरे हृदि चावगाढे
शंसन्ति कार्यावतरं हि सन्तः ॥
स राजपुत्रीहृदयं बुभुत्सुः ।
ह्रदे गभीरे हृदि चावगाढे
शंसन्ति कार्यावतरं हि सन्तः ॥
अन्वयः
AI
सः पत्री राजपुत्रीहृदयं बुभुत्सुः इति ईरयित्वा विरराम । हि सन्तः गभीरे ह्रदे अवगाढे हृदि च कार्य अवतरं शंसन्ति ।
Summary
AI
Having spoken thus, that bird (the swan), wishing to know the princess's heart, fell silent. Indeed, the wise praise undertaking a task only after fathoming its depth, just as one enters a deep lake or a profound heart.
पदच्छेदः
AI
| इति | इति | thus |
| ईरयित्वा | ईरयित्वा (√ईर्+णिच्+क्त्वा) | having spoken |
| विरराम | विरराम (वि√रम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | stopped |
| पत्री | पत्रिन् (१.१) | the bird |
| सः | तद् (१.१) | he |
| राजपुत्रीहृदयं | राजपुत्री–हृदय (२.१) | the princess's heart |
| बुभुत्सुः | बुभुत्सु (√बुध्+सन्+उ, १.१) | desirous of knowing |
| ह्रदे | ह्रद (७.१) | in a lake |
| गभीरे | गभीर (७.१) | deep |
| हृदि | हृद् (७.१) | in a heart |
| च | च | and |
| अवगाढे | अवगाढ (अव√गाह्+क्त, ७.१) | profound |
| शंसन्ति | शंसन्ति (√शंस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | praise |
| कार्यावतरं | कार्य–अवतर (२.१) | the undertaking of a task |
| हि | हि | indeed |
| सन्तः | सत् (१.३) | the good/wise people |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ती | र | यि | त्वा | वि | र | रा | म | प | त्री |
| स | रा | ज | पु | त्री | हृ | द | यं | बु | भु | त्सुः |
| ह्र | दे | ग | भी | रे | हृ | दि | चा | व | गा | ढे |
| शं | स | न्ति | का | र्या | व | त | रं | हि | स | न्तः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.