निशा शशाङ्कं शिवया गिरीशं
श्रिया हरिं योजयतः प्रतीतः ।
विधेरपि स्वारसिकः प्रयासः
परस्परं योग्यसमागमाय ॥
निशा शशाङ्कं शिवया गिरीशं
श्रिया हरिं योजयतः प्रतीतः ।
विधेरपि स्वारसिकः प्रयासः
परस्परं योग्यसमागमाय ॥
श्रिया हरिं योजयतः प्रतीतः ।
विधेरपि स्वारसिकः प्रयासः
परस्परं योग्यसमागमाय ॥
अन्वयः
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निशा शशाङ्कम्, शिवया गिरीशम्, श्रिया हरिम् योजयतः विधेः अपि परस्परम् योग्य-समागमाय स्वारसिकः प्रयासः प्रतीतः अस्ति ।
Summary
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It is well-known that even for the Creator—who unites the Moon with the Night, Shiva with Pārvatī, and Vishnu with Lakshmī—the natural effort is always towards bringing about the union of suitable pairs.
पदच्छेदः
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| निशा | निशा (३.१) | with the Night |
| शशाङ्कम् | शशाङ्क (२.१) | the Moon |
| शिवया | शिवा (३.१) | with Shivā (Pārvatī) |
| गिरीशम् | गिरीश (२.१) | Girīśa (Shiva) |
| श्रिया | श्री (३.१) | with Shrī (Lakshmī) |
| हरिम् | हरि (२.१) | Hari (Vishnu) |
| योजयतः | योजयत् (√युज्+णिच्+शतृ, ६.१) | of the one who joins |
| प्रतीतः | प्रतीत (प्रति√इ+क्त, १.१) | is known |
| विधेः | विधि (६.१) | of the Creator |
| अपि | अपि | even |
| स्वारसिकः | स्वारसिक (१.१) | natural |
| प्रयासः | प्रयास (१.१) | effort |
| परस्परम् | परस्परम् | for mutual |
| योग्य | योग्य | suitable |
| समागमाय | समागमाय (४.१) | union |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | शा | श | शा | ङ्कं | शि | व | या | गि | री | शं |
| श्रि | या | ह | रिं | यो | ज | य | तः | प्र | ती | तः |
| वि | धे | र | पि | स्वा | र | सि | कः | प्र | या | सः |
| प | र | स्प | रं | यो | ग्य | स | मा | ग | मा | य |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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