तस्यैव वा यास्यसि किं न हस्तं
दृष्टं मनः केन विधेः प्रविश्य ।
अजातपाणिग्रहणासि ताव-
द्रूपस्वरूपातिशयाश्रयश्च ॥
तस्यैव वा यास्यसि किं न हस्तं
दृष्टं मनः केन विधेः प्रविश्य ।
अजातपाणिग्रहणासि ताव-
द्रूपस्वरूपातिशयाश्रयश्च ॥
दृष्टं मनः केन विधेः प्रविश्य ।
अजातपाणिग्रहणासि ताव-
द्रूपस्वरूपातिशयाश्रयश्च ॥
अन्वयः
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वा तस्य एव हस्तम् किम् न यास्यसि? विधेः मनः प्रविश्य केन दृष्टम्? तावत् अजात-पाणिग्रहणा असि, च रूप-स्वरूप-अतिशय-आश्रयः (त्वम् असि) ।
Summary
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Or why will you not go to his hand in marriage? Who has entered the mind of Fate to see its designs? For now, you are unmarried, and you are the very abode of the excellence of beauty and form.
पदच्छेदः
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| तस्य | तद् (६.१) | his |
| एव | एव | very |
| वा | वा | Or |
| यास्यसि | यास्यसि (√या कर्तरि लृट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you will go to |
| किम् | किम् | why |
| न | न | not |
| हस्तम् | हस्त (२.१) | the hand |
| दृष्टम् | दृष्ट (√दृश्+क्त, १.१) | has been seen |
| मनः | मनस् (१.१) | the mind |
| केन | किम् (३.१) | by whom |
| विधेः | विधि (६.१) | of Fate |
| प्रविश्य | प्रविश्य (प्र√विश्+ल्यप्) | having entered |
| अजात | अजात (न√जन्+क्त) | not happened |
| पाणिग्रहणा | पाणिग्रहण (१.१) | whose marriage |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are |
| तावत् | तावत् | for now |
| रूप | रूप | of beauty |
| स्वरूप | स्वरूप | of form |
| अतिशय | अतिशय | of excellence |
| आश्रयः | आश्रय (१.१) | the abode |
| च | च | and |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्यै | व | वा | या | स्य | सि | किं | न | ह | स्तं |
| दृ | ष्टं | म | नः | के | न | वि | धेः | प्र | वि | श्य |
| अ | जा | त | पा | णि | ग्र | ह | णा | सि | ता | व |
| द्रू | प | स्व | रू | पा | ति | श | या | श्र | य | श्च |
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