हंसं तनौ सन्निहितं चरन्तं
मुनेर्मनोवृत्तिरिव स्विकायाम् ।
ग्रहीतुकामादरिणा शयेन
यत्नादसौ निश्चलतां जगाहे ॥
हंसं तनौ सन्निहितं चरन्तं
मुनेर्मनोवृत्तिरिव स्विकायाम् ।
ग्रहीतुकामादरिणा शयेन
यत्नादसौ निश्चलतां जगाहे ॥
मुनेर्मनोवृत्तिरिव स्विकायाम् ।
ग्रहीतुकामादरिणा शयेन
यत्नादसौ निश्चलतां जगाहे ॥
अन्वयः
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असौ स्विकायाम् तनौ सन्निहितम् चरन्तम् हंसम्, मुनेः मनः-वृत्तिः इव, दरिणा शयेन ग्रहीतुम्-कामा (सती) यत्नात् निश्चलताम् जगाहे ।
Summary
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She (Damayanti), desiring to catch the swan that was moving nearby, became motionless with great effort by crouching stealthily, just as a sage's mental faculty tries to grasp the soul present within one's own body.
पदच्छेदः
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| हंसं | हंस (२.१) | the swan |
| तनौ | तनु (७.१) | in the body |
| सन्निहितं | सन्निहित (सम्+नि√धा+क्त, २.१) | present |
| चरन्तं | चरन्त् (√चर्+शतृ, २.१) | moving |
| मुनेः | मुनि (६.१) | of a sage |
| मनोवृत्तिरिव | मनस्–वृत्ति (१.१)–इव | like the faculty of the mind |
| स्विकायाम् | स्विका (७.१) | in one's own |
| ग्रहीतुकामा | ग्रहीतुम् (√ग्रह्+तुमुन्)–कामा (१.१) | desiring to catch |
| दरिणा | दरि (३.१) | stealthily |
| शयेन | शय (३.१) | by crouching |
| यत्नात् | यत्न (५.१) | with effort |
| असौ | अदस् (१.१) | she (Damayanti) |
| निश्चलतां | निश्चलता (२.१) | motionlessness |
| जगाहे | जगाहे (√गाह् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | attained |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| हं | सं | त | नौ | स | न्नि | हि | तं | च | र | न्तं |
| मु | ने | र्म | नो | वृ | त्ति | रि | व | स्वि | का | याम् |
| ग्र | ही | तु | का | मा | द | रि | णा | श | ये | न |
| य | त्ना | द | सौ | नि | श्च | ल | तां | ज | गा | हे |
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