नेत्राणि वैदर्भसुतासखीनां
विमुक्ततत्तद्विषयग्रहाणि ।
प्रापुस्तमेकं निरुपाख्यरूपं
ब्रह्मेव चेतांसि यतव्रतानाम् ॥
नेत्राणि वैदर्भसुतासखीनां
विमुक्ततत्तद्विषयग्रहाणि ।
प्रापुस्तमेकं निरुपाख्यरूपं
ब्रह्मेव चेतांसि यतव्रतानाम् ॥
विमुक्ततत्तद्विषयग्रहाणि ।
प्रापुस्तमेकं निरुपाख्यरूपं
ब्रह्मेव चेतांसि यतव्रतानाम् ॥
अन्वयः
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यत-व्रतानाम् चेतांसि निरुपाख्य-रूपम् एकम् ब्रह्म इव, वैदर्भ-सुता-सखीनाम् विमुक्त-तत्-तत्-विषय-ग्रहाणि नेत्राणि तम् एकम् प्रापुः ।
Summary
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The eyes of Damayanti's friends, having let go of their respective objects of perception, fixed upon that one swan, just as the minds of ascetics, who have controlled their vows, attain the one Brahman, whose form is indefinable.
पदच्छेदः
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| नेत्राणि | नेत्र (१.३) | The eyes |
| वैदर्भसुतासखीनां | वैदर्भ–सुता–सखी (६.३) | of the friends of the daughter of Vidarbha |
| विमुक्ततत्तद्विषयग्रहाणि | विमुक्त (वि√मुच्+क्त)–तद्-तद्–विषय–ग्रह (१.३) | which had let go of their respective objects of perception |
| प्रापुः | प्रापुः (प्र√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | attained |
| तम् | तद् (२.१) | him (the swan) |
| एकं | एक (२.१) | the one |
| निरुपाख्यरूपं | निरुपाख्य–रूप (२.१) | whose form is indefinable |
| ब्रह्म | ब्रह्मन् (२.१) | Brahman |
| इव | इव | like |
| चेतांसि | चेतस् (१.३) | the minds |
| यतव्रतानाम् | यत (√यम्+क्त)–व्रत (६.३) | of those who have controlled their vows (ascetics) |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ने | त्रा | णि | वै | द | र्भ | सु | ता | स | खी | नां |
| वि | मु | क्त | त | त्त | द्वि | ष | य | ग्र | हा | णि |
| प्रा | पु | स्त | मे | कं | नि | रु | पा | ख्य | रू | पं |
| ब्र | ह्मे | व | चे | तां | सि | य | त | व्र | ता | नाम् |
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