संज्ञाप्य नः स्वध्वजभृत्यवर्गा-
न्दैत्यारिरत्यब्जनलास्यनुत्यै ।
तत्संकुचन्नाभिसरोजपीता-
द्धातुर्विलज्जं रमते रमायाम् ॥
संज्ञाप्य नः स्वध्वजभृत्यवर्गा-
न्दैत्यारिरत्यब्जनलास्यनुत्यै ।
तत्संकुचन्नाभिसरोजपीता-
द्धातुर्विलज्जं रमते रमायाम् ॥
न्दैत्यारिरत्यब्जनलास्यनुत्यै ।
तत्संकुचन्नाभिसरोजपीता-
द्धातुर्विलज्जं रमते रमायाम् ॥
अन्वयः
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दैत्यारिः अब्जम् नलास्यं अति (इति) नः स्वध्वजभृत्यवर्गान् संज्ञाप्य, तत्संकुचन्नाभिसरोजपीतात् धातुः विलज्जम् रमायाम् रमते ।
Summary
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"Vishnu, having informed us—his banner-servants (swans)—that Nala's face surpasses the lotus in beauty, now shamelessly delights in Lakshmi. This is because Brahma, born from Vishnu's navel-lotus, is shamed by the defeat of his own birthplace by Nala's face, and thus feels no jealousy."
पदच्छेदः
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| संज्ञाप्य | संज्ञाप्य (सम्√ज्ञा+णिच्+ल्यप्) | having informed |
| नः | अस्मद् (२.३) | us |
| स्वध्वजभृत्यवर्गान् | स्व–ध्वज–भृत्य–वर्ग (२.३) | his own groups of banner-servants |
| दैत्यारिः | दैत्यारि (१.१) | the enemy of demons (Vishnu) |
| अति | अति | surpasses |
| अब्जम् | अब्ज (२.१) | the lotus |
| नलास्यनुत्यै | नल–आस्य–नुति (४.१) | for the praise of Nala's face |
| तत् | तद् | that |
| संकुचत् | संकुचत् (सम्√कुच्+शतृ) | shrinking |
| नाभिसरोजपीतात् | नाभि–सरोज–पीत (५.१) | from the defeat of his navel-lotus |
| धातुः | धातृ (१.१) | Brahma |
| विलज्जम् | विलज्जम् | shamelessly |
| रमते | रमते (√रम् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | takes delight |
| रमायाम् | रमा (७.१) | in Lakshmi |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | ज्ञा | प्य | नः | स्व | ध्व | ज | भृ | त्य | व | र्गा |
| न्दै | त्या | रि | र | त्य | ब्ज | न | ला | स्य | नु | त्यै |
| त | त्सं | कु | च | न्ना | भि | स | रो | ज | पी | ता |
| द्धा | तु | र्वि | ल | ज्जं | र | म | ते | र | मा | याम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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