सरसि नृपमपश्यद्यत्र तत्तीरभाजः
स्मरतरलमशोकानोकहस्योपमूलम् ।
किसलयदलतल्पम्लायिनं प्राप तं स
ज्वलदसमशरेषुस्पर्धिपुष्पार्द्धिमौलेः ॥
सरसि नृपमपश्यद्यत्र तत्तीरभाजः
स्मरतरलमशोकानोकहस्योपमूलम् ।
किसलयदलतल्पम्लायिनं प्राप तं स
ज्वलदसमशरेषुस्पर्धिपुष्पार्द्धिमौलेः ॥
स्मरतरलमशोकानोकहस्योपमूलम् ।
किसलयदलतल्पम्लायिनं प्राप तं स
ज्वलदसमशरेषुस्पर्धिपुष्पार्द्धिमौलेः ॥
अन्वयः
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सः (हंसः) यत्र सरसि तत्-तीर-भाजः ज्वलत्-असम-शर-इषु-स्पर्धि-पुष्प-अर्धि-मौलेः अशोक-अनोकहस्य उपमूलम् स्मर-तरलम् किसलय-दल-तल्प-म्लायिनम् नृपम् अपश्यत्, तम् प्राप।
Summary
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The swan found the king by a lake, near the root of an Ashoka tree on its bank. The king, agitated by love, was wilting on a bed of tender leaves. The tree itself had a crest of flowers whose splendor rivaled the shining arrows of Kama.
पदच्छेदः
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| सरसि | सरस् (७.१) | by a lake |
| नृपम् | नृप (२.१) | the king |
| अपश्यत् | अपश्यत् (√दृश् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he saw |
| यत्र | यत्र | where |
| तत्-तीर-भाजः | तत्तीरभाज् (६.१) | on its bank |
| स्मर-तरलम् | स्मरतरल (२.१) | agitated by love |
| अशोक-अनोकहस्य | अशोकानोकह (६.१) | of an Ashoka tree |
| उपमूलम् | उपमूलम् | near the root |
| किसलय-दल-तल्प-म्लायिनम् | किसलयदलतल्पम्लायिन् (२.१) | wilting on a bed of tender leaves |
| प्राप | प्राप (प्र√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | reached |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| सः | तद् (१.१) | he (the swan) |
| ज्वलत्-असम-शर-इषु-स्पर्धि-पुष्प-अर्धि-मौलेः | ज्वलदसमशरेषुस्पर्धिपुष्पार्धिमौलि (६.१) | whose crest of flowers rivaled the splendor of Kama's shining arrows |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | र | सि | नृ | प | म | प | श्य | द्य | त्र | त | त्ती | र | भा | जः |
| स्म | र | त | र | ल | म | शो | का | नो | क | ह | स्यो | प | मू | लम् |
| कि | स | ल | य | द | ल | त | ल्प | म्ला | यि | नं | प्रा | प | तं | स |
| ज्व | ल | द | स | म | श | रे | षु | स्प | र्धि | पु | ष्पा | र्द्धि | मौ | लेः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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