चेतोजन्मशरप्रसूनमधुभिर्व्यामिश्रतामाश्रय-
त्त्प्रेयोदूतपतङ्गपुङ्गवगवीहैयङ्गवीनं रसात् ।
स्वादं स्वादमसीममिष्टसुरभि प्राप्तापि तृप्तिं न सा
तापं प्राप नितान्तमन्तरतुलामानर्च्छ मूर्च्छामपि ॥
चेतोजन्मशरप्रसूनमधुभिर्व्यामिश्रतामाश्रय-
त्त्प्रेयोदूतपतङ्गपुङ्गवगवीहैयङ्गवीनं रसात् ।
स्वादं स्वादमसीममिष्टसुरभि प्राप्तापि तृप्तिं न सा
तापं प्राप नितान्तमन्तरतुलामानर्च्छ मूर्च्छामपि ॥
त्त्प्रेयोदूतपतङ्गपुङ्गवगवीहैयङ्गवीनं रसात् ।
स्वादं स्वादमसीममिष्टसुरभि प्राप्तापि तृप्तिं न सा
तापं प्राप नितान्तमन्तरतुलामानर्च्छ मूर्च्छामपि ॥
अन्वयः
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सा प्रेयः-दूत-पतङ्ग-पुङ्गव-गवी-हैयङ्गवीनम्, चेतः-जन्म-शर-प्रसून-मधुभिः व्यामिश्रताम् आश्रयत्, असीमम् इष्ट-सुरभि (च), रसात् स्वादम् स्वादम्, तृप्तिम् प्राप्ता अपि न (प्राप)। (सा) नितान्तम् तापम् प्राप, अन्तः-अतुलाम् मूर्च्छाम् अपि आनर्च्छ।
Summary
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She (Damayanti), repeatedly relishing the boundless and fragrant speech of the swan—which was like fresh butter mixed with the honey of Kama's flower-arrows—did not attain satisfaction. Instead, she felt extreme anguish and even fell into an incomparable state of swoon.
पदच्छेदः
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| चेतः-जन्म-शर-प्रसून-मधुभिः | चेतोजन्म–शर–प्रसून–मधु (३.३) | with the honey of the flower-arrows of Kama |
| व्यामिश्रताम् | व्यामिश्रता (२.१) | a state of being mixed |
| आश्रयत् | आश्रयत् (आ√श्रि+शतृ, २.१) | which resorted to |
| प्रेयः-दूत-पतङ्ग-पुङ्गव-गवी-हैयङ्गवीनम् | प्रेयस्–दूत–पतङ्गपुङ्गव–गवी–हैयङ्गवीन (२.१) | the fresh butter of the speech of the best of birds, the messenger of her beloved |
| रसात् | रस (५.१) | with relish |
| स्वादम् | स्वादम् (√स्वद्+ण्यमुल्) | tasting |
| स्वादम् | स्वादम् (√स्वद्+ण्यमुल्) | and tasting |
| असीमम् | असीम (२.१) | boundless |
| इष्ट-सुरभि | इष्टसुरभि (२.१) | pleasantly fragrant |
| प्राप्ता | प्राप्त (प्र√आप्+क्त, १.१) | having attained |
| अपि | अपि | even |
| तृप्तिम् | तृप्ति (२.१) | satisfaction |
| न | न | not |
| सा | तद् (१.१) | she |
| तापम् | ताप (२.१) | anguish |
| प्राप | प्राप (प्र√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attained |
| नितान्तम् | नितान्तम् | extremely |
| अन्तः-अतुलाम् | अन्तः–अतुला (२.१) | incomparable within |
| आनर्च्छ | आनर्च्छ (√ऋच्छ् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | reached |
| मूर्च्छाम् | मूर्च्छा (२.१) | fainting |
| अपि | अपि | even |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चे | तो | ज | न्म | श | र | प्र | सू | न | म | धु | भि | र्व्या | मि | श्र | ता | मा | श्र | य |
| त्त्प्रे | यो | दू | त | प | त | ङ्ग | पु | ङ्ग | व | ग | वी | है | य | ङ्ग | वी | नं | र | सात् |
| स्वा | दं | स्वा | द | म | सी | म | मि | ष्ट | सु | र | भि | प्रा | प्ता | पि | तृ | प्तिं | न | सा |
| ता | पं | प्रा | प | नि | ता | न्त | म | न्त | र | तु | ला | मा | न | र्च्छ | मू | र्च्छा | म | पि |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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