कामः कौसुमचापदुर्जयममुं जेतुं नृपं त्वां धनु-
र्वल्लीमव्रणवंशजामधिगुणामासाद्य माद्यत्यसौ ।
ग्रीवालंकृतिपट्टसूत्रलतया पृष्ठे कियल्लम्बया
भ्राजिष्णुं कषरेखयेव निवसत्सिन्दूरसौन्दर्यया ॥
कामः कौसुमचापदुर्जयममुं जेतुं नृपं त्वां धनु-
र्वल्लीमव्रणवंशजामधिगुणामासाद्य माद्यत्यसौ ।
ग्रीवालंकृतिपट्टसूत्रलतया पृष्ठे कियल्लम्बया
भ्राजिष्णुं कषरेखयेव निवसत्सिन्दूरसौन्दर्यया ॥
र्वल्लीमव्रणवंशजामधिगुणामासाद्य माद्यत्यसौ ।
ग्रीवालंकृतिपट्टसूत्रलतया पृष्ठे कियल्लम्बया
भ्राजिष्णुं कषरेखयेव निवसत्सिन्दूरसौन्दर्यया ॥
अन्वयः
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असौ कामः कौसुम-चाप-दुर्जयम्, पृष्ठे कियत्-लम्बया निवसत्-सिन्दूर-सौन्दर्यया ग्रीवा-अलंकृति-पट्ट-सूत्र-लतया कष-रेखया इव भ्राजिष्णुम् अमुं नृपं त्वां जेतुम्, अव्रण-वंश-जाम् अधिगुणाम् धनुः-वल्लीम् (दमयन्तीम्) आसाद्य माद्यति।
Summary
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The swan tells Nala: "Kama, the god of love, becomes intoxicated with pride to conquer you—a king difficult to defeat with his flower-bow—having obtained Damayanti as his flawless, strung bow-creeper. He is eager to conquer you, who shines as if marked on the back by a streak of vermilion, which is actually the slightly hanging, beautiful silk-thread-like braid of Damayanti."
पदच्छेदः
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| कामः | काम (१.१) | Kama (the god of love) |
| कौसुमचापदुर्जयम् | कौसुम–चाप–दुर्जय (२.१) | who is difficult to conquer with a flower-bow |
| अमुम् | अदस् (२.१) | that |
| जेतुम् | जेतुम् (√जि+तुमुन्) | to conquer |
| नृपम् | नृप (२.१) | king |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| धनुर्वल्लीम् | धनुस्–वल्ली (२.१) | as a bow-creeper |
| अव्रणवंशजाम् | अव्रण–वंश–जा (२.१) | born of a flawless lineage |
| अधिगुणाम् | अधिगुण (२.१) | strung |
| आसाद्य | आसाद्य (आ√सद्+ल्यप्) | having obtained |
| माद्यति | माद्यति (√मद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | becomes intoxicated |
| असौ | अदस् (१.१) | he |
| ग्रीवालंकृतिपट्टसूत्रलतया | ग्रीवा–अलंकृति–पट्टसूत्र–लता (३.१) | by the creeper-like silk thread of the neck ornament |
| पृष्ठे | पृष्ठ (७.१) | on the back |
| कियल्लम्बया | कियत्–लम्बा (३.१) | slightly hanging |
| भ्राजिष्णुम् | भ्राजिष्णु (√भ्राज्+इष्णुच्, २.१) | shining |
| कषरेखया | कषरेखा (३.१) | like a streak on a touchstone |
| इव | इव | like |
| निवसत्सिन्दूरसौन्दर्यया | निवसत्–सिन्दूर–सौन्दर्य (३.१) | possessing the beauty of vermilion |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | मः | कौ | सु | म | चा | प | दु | र्ज | य | म | मुं | जे | तुं | नृ | पं | त्वां | ध | नु |
| र्व | ल्ली | म | व्र | ण | वं | श | जा | म | धि | गु | णा | मा | सा | द्य | मा | द्य | त्य | सौ |
| ग्री | वा | लं | कृ | ति | प | ट्ट | सू | त्र | ल | त | या | पृ | ष्ठे | कि | य | ल्ल | म्ब | या |
| भ्रा | जि | ष्णुं | क | ष | रे | ख | ये | व | नि | व | स | त्सि | न्दू | र | सौ | न्द | र्य | या |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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