अहो तपः कल्पतरुर्नलीयः
त्वत्पाणिजाग्रस्फुरदङ्कुरश्रीः ।
त्वद्भ्रूयुगं यस्य खलु द्विपत्री
तवाधरो रज्यति यत्कलम्बः ॥
अहो तपः कल्पतरुर्नलीयः
त्वत्पाणिजाग्रस्फुरदङ्कुरश्रीः ।
त्वद्भ्रूयुगं यस्य खलु द्विपत्री
तवाधरो रज्यति यत्कलम्बः ॥
त्वत्पाणिजाग्रस्फुरदङ्कुरश्रीः ।
त्वद्भ्रूयुगं यस्य खलु द्विपत्री
तवाधरो रज्यति यत्कलम्बः ॥
अन्वयः
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अहो, नलीयः तपः-कल्पतरुः अस्ति, यः त्वत्-पाणिज-अग्र-स्फुरत्-अङ्कुर-श्रीः अस्ति । यस्य त्वत्-भ्रू-युगम् खलु द्वि-पत्री अस्ति, यत्-कलम्बः तव अधरः रज्यति ।
Summary
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Oh! Nala's penance is a wish-fulfilling tree, whose beauty is the sprouting shoot shining at the tips of your fingernails. Your pair of eyebrows are its two leaves, and your lower lip is its reddening young shoot.
पदच्छेदः
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| अहो | अहो | Oh |
| तपःकल्पतरुः | तपस्–कल्पतरु (१.१) | the wish-fulfilling tree of penance |
| नलीयः | नलीय (१.१) | of Nala |
| त्वत्पाणिजाग्रस्फुरदङ्कुरश्रीः | त्वद्–पाणिज–अग्र–स्फुरत्–अङ्कुर–श्री (१.१) | whose beauty is the shining sprout at the tip of your fingernails |
| त्वद्भ्रूयुगम् | त्वद्–भ्रूयुग (१.१) | your pair of eyebrows |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| खलु | खलु | indeed |
| द्विपत्री | द्विपत्री (१.१) | two leaves |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| अधरः | अधर (१.१) | lower lip |
| रज्यति | रज्यति (√रञ्ज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | becomes red |
| यत्कलम्बः | यद्–कलम्ब (१.१) | whose young shoot |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | हो | त | पः | क | ल्प | त | रु | र्न | ली | यः |
| त्व | त्पा | णि | जा | ग्र | स्फु | र | द | ङ्कु | र | श्रीः |
| त्व | द्भ्रू | यु | गं | य | स्य | ख | लु | द्वि | प | त्री |
| त | वा | ध | रो | र | ज्य | ति | य | त्क | ल | म्बः |
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