एकः सुधांशुर्न कथंचन स्या-
त्तृप्तिक्षमस्त्वन्नयनद्वयस्य ।
त्वल्लोचनासेचनकस्तदस्तु
नलास्यशीतद्युतिसद्वितीयः ॥
एकः सुधांशुर्न कथंचन स्या-
त्तृप्तिक्षमस्त्वन्नयनद्वयस्य ।
त्वल्लोचनासेचनकस्तदस्तु
नलास्यशीतद्युतिसद्वितीयः ॥
त्तृप्तिक्षमस्त्वन्नयनद्वयस्य ।
त्वल्लोचनासेचनकस्तदस्तु
नलास्यशीतद्युतिसद्वितीयः ॥
अन्वयः
AI
एकः सुधांशुः त्वत्-नयन-द्वयस्य कथंचन तृप्ति-क्षमः न स्यात् । तत् नल-आस्य-शीतद्युति-सद्वितीयः सुधांशुः त्वत्-लोचन-आसेचनकः अस्तु ।
Summary
AI
A single moon can in no way be capable of satisfying your two eyes. Therefore, let there be a feast for your eyes when the moon is accompanied by a second one: the moon of Nala's face.
पदच्छेदः
AI
| एकः | एक (१.१) | one |
| सुधांशुः | सुधांशु (१.१) | moon |
| न | न | not |
| कथंचन | कथंचन | in any way |
| स्यात् | स्यात् (√अस् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | can be |
| तृप्तिक्षमः | तृप्ति–क्षम (१.१) | capable of satisfying |
| त्वन्नयनद्वयस्य | त्वद्–नयनद्वय (६.१) | of your pair of eyes |
| त्वल्लोचनासेचनकः | त्वद्–लोचन–आसेचनक (१.१) | a feast for your eyes |
| तत् | तद् | therefore |
| अस्तु | अस्तु (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let there be |
| नलास्यशीतद्युतिसद्वितीयः | नल–आस्य–शीतद्युति–सद्वितीय (१.१) | the one accompanied by the moon of Nala's face |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | कः | सु | धां | शु | र्न | क | थं | च | न | स्या |
| त्तृ | प्ति | क्ष | म | स्त्व | न्न | य | न | द्व | य | स्य |
| त्व | ल्लो | च | ना | से | च | न | क | स्त | द | स्तु |
| न | ला | स्य | शी | त | द्यु | ति | स | द्वि | ती | यः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.