रुषा निषिद्धालिजनां यदैनां
छायाद्वितीयां कलयांचकार ।
तदा श्रमाम्भःकणभूषिताङ्गीं
स कीरवन्मानुषवागवादीत् ॥
रुषा निषिद्धालिजनां यदैनां
छायाद्वितीयां कलयांचकार ।
तदा श्रमाम्भःकणभूषिताङ्गीं
स कीरवन्मानुषवागवादीत् ॥
छायाद्वितीयां कलयांचकार ।
तदा श्रमाम्भःकणभूषिताङ्गीं
स कीरवन्मानुषवागवादीत् ॥
अन्वयः
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यदा सः रुषा निषिद्ध-आलि-जनाम्, छाया-द्वितीयाम् एनाम् कलयांचकार, तदा श्रम-अम्भः-कण-भूषित-अङ्गीम् (एनाम् प्रति) कीरवत् मानुष-वाक् अवादीत्।
Summary
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When he (the swan) observed her, who in her anger had forbidden her friends to follow and was accompanied only by her shadow, he then spoke to her, whose body was adorned with beads of perspiration from exertion, in a human voice like a parrot.
पदच्छेदः
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| रुषा | रुष् (३.१) | with anger |
| निषिद्ध-आलि-जनाम् | निषिद्ध (नि√षिध्+क्त)–आलिजन | one by whom the group of friends was forbidden |
| यदा | यदा | when |
| एनाम् | एनद् (२.१) | her |
| छाया-द्वितीयाम् | छाया–द्वितीय | one whose only companion was her shadow |
| कलयांचकार | कलयांचकार (√कलय् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | observed |
| तदा | तदा | then |
| श्रम-अम्भः-कण-भूषित-अङ्गीम् | श्रम–अम्भस्–कण–भूषित (√भूष्+क्त)–अङ्गी | her whose body was adorned with drops of perspiration |
| सः | तद् (१.१) | he |
| कीरवत् | कीरवत् | like a parrot |
| मानुष-वाक् | मानुष–वाच् (२.१) | human speech |
| अवादीत् | अवादीत् (√वद् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spoke |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रु | षा | नि | षि | द्धा | लि | ज | नां | य | दै | नां |
| छा | या | द्वि | ती | यां | क | ल | यां | च | का | र |
| त | दा | श्र | मा | म्भः | क | ण | भू | षि | ता | ङ्गीं |
| स | की | र | व | न्मा | नु | ष | वा | ग | वा | दीत् |
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