सव्यापसव्यत्यजनाद्द्विरुक्तैः
पञ्चेषुबाणैः पृथगर्जितासु ।
दशासु शेषा खलु तद्दशा या
तया नभः पुष्प्यतु कोरकेण ॥
सव्यापसव्यत्यजनाद्द्विरुक्तैः
पञ्चेषुबाणैः पृथगर्जितासु ।
दशासु शेषा खलु तद्दशा या
तया नभः पुष्प्यतु कोरकेण ॥
पञ्चेषुबाणैः पृथगर्जितासु ।
दशासु शेषा खलु तद्दशा या
तया नभः पुष्प्यतु कोरकेण ॥
अन्वयः
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सव्य-अपसव्य-त्यजनात् द्वि-उक्तैः पञ्च-इषु-बाणैः पृथक् अर्जितासु दशासु मध्ये या तत्-दशा शेषा खलु, तया कोरकेण नभः पुष्प्यतु ।
Summary
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Among the ten states of love, separately caused by the five arrows of Kamadeva shot twice, the one state that remains for him is the final one (death). Let the sky blossom with that bud! (A poetic way of saying his last state is an impossibility, like a sky-flower).
पदच्छेदः
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| सव्यापसव्यत्यजनात् | सव्य–अपसव्य–त्यजन (५.१) | from the releasing from left and right |
| द्विरुक्तैः | द्विरुक्त (३.३) | by the repeated (twice-shot) |
| पञ्चेषुबाणैः | पञ्चेषु–बाण (३.३) | by the arrows of the five-arrowed one (Kama) |
| पृथक् | पृथक् | separately |
| अर्जितासु | अर्जित (√ऋज्+क्त, ७.३) | in the acquired |
| दशासु | दशा (७.३) | states (of love) |
| शेषा | शेष (१.१) | remaining |
| खलु | खलु | indeed |
| तद्दशा | तद्–दशा (१.१) | his state |
| या | यद् (१.१) | which |
| तया | तद् (३.१) | by that |
| नभः | नभस् (१.१) | the sky |
| पुष्प्यतु | पुष्प्यतु (√पुष्प् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it blossom |
| कोरकेण | कोरक (३.१) | with a bud |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | व्या | प | स | व्य | त्य | ज | ना | द्द्वि | रु | क्तैः |
| प | ञ्चे | षु | बा | णैः | पृ | थ | ग | र्जि | ता | सु |
| द | शा | सु | शे | षा | ख | लु | त | द्द | शा | या |
| त | या | न | भः | पु | ष्प्य | तु | को | र | के | ण |
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