भवद्वियोगाच्छिदुरार्तिधारा-
यमस्वसुर्मज्जति निःशरण्यः ।
मूर्च्छामयद्वीपमहान्ध्यपङ्के
हा हा महीभृद्भटकुञ्जरोऽयम् ॥
भवद्वियोगाच्छिदुरार्तिधारा-
यमस्वसुर्मज्जति निःशरण्यः ।
मूर्च्छामयद्वीपमहान्ध्यपङ्के
हा हा महीभृद्भटकुञ्जरोऽयम् ॥
यमस्वसुर्मज्जति निःशरण्यः ।
मूर्च्छामयद्वीपमहान्ध्यपङ्के
हा हा महीभृद्भटकुञ्जरोऽयम् ॥
अन्वयः
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हा हा, अयम् महीभृत्-भट-कुञ्जरः निःशरण्यः (सन्) भवत्-वियोगात् छिदुर-आर्ति-धारा-यमस्वसुः मूर्च्छा-मय-द्वीप-महा-अन्ध्य-पङ्के मज्जति ।
Summary
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Alas, alas! This elephant among warrior-kings, helpless due to separation from you, sinks into the great blinding mud of the island of fainting, in the river Yamuna which is the incessant stream of his intense suffering.
पदच्छेदः
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| भवद्वियोगात् | भवत्–वियोग (५.१) | from separation from you |
| छिदुरार्तिधारायमस्वसुः | छिदुर–आर्ति–धारा–यमस्वसृ (७.१) | in the river Yamuna which is the incessant stream of intense suffering |
| मज्जति | मज्जति (√मस्ज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | sinks |
| निःशरण्यः | निःशरण्य (१.१) | helpless |
| मूर्च्छामयद्वीपमहान्ध्यपङ्के | मूर्च्छा–मय–द्वीप–महा–अन्ध्य–पङ्क (७.१) | in the great blinding mud of the island of fainting |
| हा | हा | alas |
| हा | हा | alas |
| महीभृद्भटकुञ्जरः | महीभृत्–भट–कुञ्जर (१.१) | the elephant among warrior-kings |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ | व | द्वि | यो | गा | च्छि | दु | रा | र्ति | धा | रा |
| य | म | स्व | सु | र्म | ज्ज | ति | निः | श | र | ण्यः |
| मू | र्च्छा | म | य | द्वी | प | म | हा | न्ध्य | प | ङ्के |
| हा | हा | म | ही | भृ | द्भ | ट | कु | ञ्ज | रो | ऽयम् |
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