त्वत्प्रापकात्त्रस्यति नैनसोऽपि
त्वय्येष दास्येऽपि न लज्जते यत् ।
स्मरेण बाणैरतितक्ष्य तीक्ष्णैः
लूनः स्वभावोऽपि कियान्किमस्य ॥
त्वत्प्रापकात्त्रस्यति नैनसोऽपि
त्वय्येष दास्येऽपि न लज्जते यत् ।
स्मरेण बाणैरतितक्ष्य तीक्ष्णैः
लूनः स्वभावोऽपि कियान्किमस्य ॥
त्वय्येष दास्येऽपि न लज्जते यत् ।
स्मरेण बाणैरतितक्ष्य तीक्ष्णैः
लूनः स्वभावोऽपि कियान्किमस्य ॥
अन्वयः
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यत् एषः त्वत्-प्रापकात् एनसः अपि न त्रस्यति, त्वयि दास्ये अपि न लज्जते, तत् स्मरेण तीक्ष्णैः बाणैः अतितक्ष्य अस्य कियान् स्वभावः अपि लूनः किम्?
Summary
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The fact that he is not afraid of any sin that might prevent him from attaining you, and that he feels no shame even in servitude to you—how much of his very nature must have been cut away by Kamadeva, having excessively carved him with sharp arrows?
पदच्छेदः
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| त्वत्प्रापकात् | त्वत्–प्रापक (५.१) | from that which prevents attaining you |
| त्रस्यति | त्रस्यति (√त्रस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | fears |
| न | न | not |
| एनसः | एनस् (५.१) | from sin |
| अपि | अपि | even |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | towards you |
| एषः | एतद् (१.१) | he |
| दास्ये | दास्य (७.१) | in servitude |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| लज्जते | लज्जते (√लज्ज् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is ashamed |
| यत् | यत् | the fact that |
| स्मरेण | स्मर (३.१) | by Kama |
| बाणैः | बाण (३.३) | with arrows |
| अतितक्ष्य | अतितक्ष्य (अति√तक्ष्+ल्यप्) | having excessively carved |
| तीक्ष्णैः | तीक्ष्ण (३.३) | sharp |
| लूनः | लून (√लू+क्त, १.१) | is cut |
| स्वभावः | स्वभाव (१.१) | nature |
| अपि | अपि | even |
| कियान् | कियत् (१.१) | how much |
| किम् | किम् | ? |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | त्प्रा | प | का | त्त्र | स्य | ति | नै | न | सो | ऽपि |
| त्व | य्ये | ष | दा | स्ये | ऽपि | न | ल | ज्ज | ते | यत् |
| स्म | रे | ण | बा | णै | र | ति | त | क्ष्य | ती | क्ष्णैः |
| लू | नः | स्व | भा | वो | ऽपि | कि | या | न्कि | म | स्य |
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