स्मरेण निस्तक्ष्य वृथैव बाणैः
लावण्यशेषां कृशतामनायि ।
अनङ्गतामप्ययमाप्यमानः
स्पर्धां न सार्धे विजहाति तेन ॥
स्मरेण निस्तक्ष्य वृथैव बाणैः
लावण्यशेषां कृशतामनायि ।
अनङ्गतामप्ययमाप्यमानः
स्पर्धां न सार्धे विजहाति तेन ॥
लावण्यशेषां कृशतामनायि ।
अनङ्गतामप्ययमाप्यमानः
स्पर्धां न सार्धे विजहाति तेन ॥
अन्वयः
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स्मरेण बाणैः निस्तक्ष्य अयम् वृथा एव लावण्य-शेषाम् कृशताम् अनायि । अनङ्गताम् आप्यमानः अपि तेन सार्धम् स्पर्धां न विजहाति ।
Summary
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Kamadeva, by carving him with his arrows, has needlessly reduced him to a state of thinness where only his charm remains. Although Nala is thus being made almost bodiless (ananga) like Kamadeva himself, he does not give up his rivalry with him.
पदच्छेदः
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| स्मरेण | स्मर (३.१) | by Kama |
| निस्तक्ष्य | निस्तक्ष्य (निस्√तक्ष्+ल्यप्) | having carved |
| वृथा | वृथा | in vain |
| एव | एव | only |
| बाणैः | बाण (३.३) | with arrows |
| लावण्यशेषाम् | लावण्य–शेष (२.१) | in which only charm remains |
| कृशताम् | कृशता (२.१) | to thinness |
| अनायि | अनायि (आ√नी भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.)) | was led |
| अनङ्गताम् | अनङ्गता (२.१) | bodilessness |
| अपि | अपि | even |
| अयम् | इदम् (१.१) | he |
| आप्यमानः | आप्यमान (√आप्+शानच्, १.१) | being made to attain |
| स्पर्धां | स्पर्धा (२.१) | rivalry |
| न | न | not |
| सार्धम् | सार्धम् | with |
| विजहाति | विजहाति (वि√हा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | gives up |
| तेन | तद् (३.१) | him |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | रे | ण | नि | स्त | क्ष्य | वृ | थै | व | बा | णैः |
| ला | व | ण्य | शे | षां | कृ | श | ता | म | ना | यि |
| अ | न | ङ्ग | ता | म | प्य | य | मा | प्य | मा | नः |
| स्प | र्धां | न | सा | र्धे | वि | ज | हा | ति | ते | न |
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