अजस्रमारोहसि दूरदीर्घो
संकल्पसोपानततिं तदीयाम् ।
श्वासान्स वर्षत्यधिकं पुनर्य-
द्यानात्तव त्वन्मयतां तदाप्य ॥
अजस्रमारोहसि दूरदीर्घो
संकल्पसोपानततिं तदीयाम् ।
श्वासान्स वर्षत्यधिकं पुनर्य-
द्यानात्तव त्वन्मयतां तदाप्य ॥
संकल्पसोपानततिं तदीयाम् ।
श्वासान्स वर्षत्यधिकं पुनर्य-
द्यानात्तव त्वन्मयतां तदाप्य ॥
अन्वयः
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यत् सः तव त्वन्मयताम् न आत्तव, तदा अपि दूरदीर्घः (सन्) तदीयाम् संकल्प-सोपान-ततिम् अजस्रम् आरोहसि, (तथा) अधिकम् श्वासान् पुनः वर्षति ।
Summary
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The swan tells Damayanti that Nala, being far away and for a long time, constantly climbs the long ladder of thoughts about her. He sighs heavily again and again because, even then, you have not accepted complete oneness with him.
पदच्छेदः
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| अजस्रम् | अजस्रम् | incessantly |
| आरोहसि | आरोहसि (आ√रुह् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you climb |
| दूरदीर्घः | दूरदीर्घ (१.१) | long because of distance |
| संकल्पसोपानततिम् | संकल्प–सोपान–तति (२.१) | the flight of stairs of imagination |
| तदीयाम् | तदीय (२.१) | his |
| श्वासान् | श्वास (२.३) | sighs |
| सः | तद् (१.१) | he |
| वर्षति | वर्षति (√वृष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | showers |
| अधिकम् | अधिकम् | excessively |
| पुनः | पुनर् | again |
| यत् | यत् | because |
| या | यद् (१.१) | you who |
| न | न | not |
| आत्तव | आत्तवत् (आ√दा+क्तवतु, १.१) | have accepted |
| त्वन्मयताम् | त्वन्मयता (२.१) | oneness with you |
| तदा | तदा | then |
| अपि | अपि | even |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ज | स्र | मा | रो | ह | सि | दू | र | दी | र्घो |
| सं | क | ल्प | सो | पा | न | त | तिं | त | दी | याम् |
| श्वा | सा | न्स | व | र्ष | त्य | धि | कं | पु | न | र्य |
| द्या | ना | त्त | व | त्व | न्म | य | तां | त | दा | प्य |
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